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विश्व फोटोग्राफी दिवस 2026: इतिहास, तथ्य एवं भारत के पहले फोटोग्राफर | TGT PGT Art Special | Kala Lekhan

विश्व फोटोग्राफी दिवस (19 अगस्त): इतिहास, कलात्मक विकास एवं प्रमुख तथ्य फोटोग्राफी केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि दृश्यों, भावनाओं और इतिहास को एक फ्रेम में हमेशा के लिए सुरक्षित रखने का सशक्त माध्यम है। हर वर्ष 19 अगस्त को दुनिया भर में 'विश्व फोटोग्राफी दिवस' (World Photography Day) मनाया जाता है। यह दिन उन फोटोग्राफरों और वैज्ञानिकों के योगदान को समर्पित है जिन्होंने समय के पलों को स्थिर कर इतिहास का दस्तावेज बनाया। कला, प्रतियोगी परीक्षाओं (TGT/PGT/KVS Art) और इतिहास के दृष्टिकोण से फोटोग्राफी का क्रमिक विकास बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है। फोटोग्राफी की शुरुआत और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि विश्व फोटोग्राफी दिवस की ऐतिहासिक नींव 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में रखी गई थी: प्रथम स्थायी फोटोग्राफ (1826): विश्व का पहला स्थायी फोटोग्राफ फ्रांसीसी आविष्कारक जोसेफ निकेफोर नीप्स (Joseph Nicéphore Niépce) द्वारा 1826 में 'हेलोग्राफी' (Heliography) प्रक्रिया के जरिए लिया गया था। डैगरोटाइप तकनीक और पेटेंट मुक्ति (1839): फ्रांसीसी वैज्ञानिक लुई डागेरे (Louis Daguerre) ने...

बूंदी शैली

बूंदी शैली के चित्र एवं उनकी विशेषताएं बूंदी शैली बूंदी को नीला शहर तथा छोटी काशी एवं सीढ़ीदार बावड़ी का शहर भी कहा जाता है। बूंदी शहर के आसपास मुख्य रूप से परिहार, मीणा आदि जनजातियां रहती है बूंदी में हाडा राजवंश का राज्य था। भोज सिंह (1585-1607)के समय में रागमाला (1561)बूंदी शैली में चित्रित किया गया। अनिरुद्ध सिंह के समय में इस शैली का रचनात्मक विकास हुआ तथा उनके समय के व्यक्ति चित्रों में दाढ़ी मूछ मुख्य रूप बनी। राजा अनिरुद्ध सिंह हाडा का चित्र उत्कल राम ने बनाया था उमेद सिंह    राजा उमेद सिंह के काल को बूंदी शैली का स्वर्ण युग माना जाता है। इस समय के चित्रों में काफी निखार व परिष्कार आ गया था चटक एवं संजीव रंगों का उपयोग हुआ है शिकार संबंधी चित्र अधिक बने हैं तथा इस प्रकार के चित्रों में हरे रंग का उपयोग अधिक दिखाई पड़ता है उमेश सिंह द्वारा जंगली सूअर का शिकार करते हुए चित्र 1750 में बनाया गया जो काफी प्रसिद्ध हुआ राम सिंह राम सिंह के समय में बंदी के महलों को भित्तिचित्रों से  सजाया गया राम सिंह के समय के भित्ति चित्रों का विषय दरबारी जुलूस, शिकार एवं कृष्ण ...

बीएन गोस्वामी

भारतीय लघु चित्रकला इतिहास के शिल्पकार बी एन गोस्वामी चित्रतल का अवलोकन करते समय आंख चमकदार रंगों को ग्रहण कर विवरण की बारीकी एवं संदर्भ को पकड़ सके B N गोस्वामी, 2016 इंडियन एक्सप्रेस बी एन गोस्वामी की शिक्षा एवं कला अभिरुचि देश के प्रतिष्ठ प्रतिष्ठित कला समीक्षक और आर्ट हिस्टोरियन बी एन गोस्वामी का जन्म का जन्म 15 अगस्त 1933 को पंजाब प्रांत (पाकिस्तान) में हुआ था। आरंभिक शिक्षा के बाद अमृतसर के हिंदू कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की और पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से 1954 में मास्टर के डिग्री हासिल की। 1956 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुने गए तथा बिहार कैडर में काम करने के दौरान कला शिक्षा की पढ़ाई जारी रखी और 1958 ईस्वी में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। पंजाब विश्वविद्यालय में ललित कला संग्रहालय का निर्देशन किया इनका विवाह इतिहासकार एवं शिक्षाविद करुणा से हुआ बीएन गोस्वामी ने कला एवं संस्कृति पर 25 से अधिक पुस्तकों को लिखा। इन्होंने मुख्य रूप से लघु चित्रों के ऊपर अपना शोध परक कार्य किया। इसी के लिए यह कला जगत में विशेष तौर पर जाने जाते हैं   बीएन गोस...

lokkala

लोक चित्रकला (Folk Art Painting )  छत्तीसगढ़ के संदर्भ में लोक कला का अर्थ जन सामान्य की कला को लोक कला के नाम से जाना जाता है यह बिना किसी जटिल प्रक्रिया के निर्मित की जाती है अगर हम दूसरे शब्दों में कहें तो मानव द्वारा आसपास की उपलब्धि सामग्री का प्रयोगकर कर निर्मित किए जाने वाले चित्रों को भी लोककला की संज्ञा दी जाती है लोककला कलाकार कहीं पर जाकर अध्ययन नहीं करता बल्कि अपनी परंपरा और पीढ़ियों से ही यह संरक्षित और हस्तांतरित होती रहती है lok kal evam janjatiy kala evam sanskrati santhan up छत्तीसगढ़ में लोक कला कलाओं की दृष्टि से छत्तीसगढ़ काफी समृद्ध राज्य रहा है यहां के आदिवासी समाज में कलाओं का अद्भुत संसार दिखाई पड़ता है जो हमें आज ही आकर्षित और आनंदित करता रहता है चाहे आदिवासी समाज हो या कोई अन्य सभी में लोक कलाएं अवश्य दिखाई देती हैं यह अपने परंपराओं और संस्कारों से पोषित होती रहती हैं Lok kala अपने स्वरूप में विशेष तौर पर पर्व त्यौहार एवं किसी महत्वपूर्ण अवसर पर ही दिखाई पड़ती है यह अक्सर महिलाओं के द्वारा पोषित की जाती है कभी-कभी पुरुष बीच में शक्ति भाग लेते ह...

India art fair

स्रोत The Hinu हम कला की परिवर्तनकारी शक्तियों में विश्वास करते हैं इससे मानसिक स्वास्थ्य लिंग यौन अभिविन्यास जाति पारिस्थिकीय से प्रभावित करने वाले मुद्दों के आसपास महत्वपूर्ण बातचीत को पोषित करने के लिए एक उपकरण के रूप में प्रयोग करते हैं इस क्षेत्र में एकमात्र व्यवसायिक मेले के रूप में हम बाजार में गतिशीलता लाने संग्रह आधार का विस्तार करने भारतीया और दक्षिणी एशियाई कला एवं संस्कृति पर अंतरराष्ट्रीय बातचीत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी रखते हैं   जया अशोककन  इंडियन आर्ट फेयर डायरेक्टर आधुनिक एवं समकालीन कलाओं का संगम इंडियन आर्ट फेयर में देखने को मिलता है इस साल 9 फरवरी 2023 से लगाकर 12 फरवरी 2023 के मध्य इंडियन फेयर का आयोजन नई दिल्ली में किया जा रहा है इंडिया आर्ट फेयर (IAF) का यह 14 संस्करण कई मायनों में खास है इसमें 71 कला दीर्घा और 14 संस्थान भाग ले रहे हैं राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कलाओं का संगम देखा जा सकता है इंडियन आर्ट फेयर के विषय में बात करते हुए निर्देशक जया अशोकन कहती हैं हम कला और शिल्प के बीच के भेद को समाप्त करना चाहते हैं मेले में समकालीन कलाकारों क...

कला और समाज

कला और समाज Art and society डा. एस सक्सेना मानव एक सामाजिक प्राणी है, सामाजिक पर्यावरण के अनुकूल ही उसका व्यवहार विकसित होता है। जन्म से ही उसमें सामाजिक तत्व निश्चित रूप में पाये जाते हैं। शैशवावस्था से ही वह अपने परिवार के सदस्यों के सम्पर्क में रहकर सामाजिक नियमों का अभ्यस्त हो जाता है। बाल्यावस्था में वह अन्य समवयस्क बालकों के साथ क्रीड़ा कलाप में आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् यौवनावस्था में वह कुटुम्ब तथा समाज के अन्य व्यक्तियों के संसर्ग में श्राता है। इस प्रकार आरम्भ से ही व्यक्ति के हृदय-पटल पर प्रत्येक स्थिति में अन्य व्यक्तियों तथा सामूहिक रूप में समाज का संसर्गजन्य प्रभाव हर क्षण पड़ता रहता है। इन सामाजिक परिस्थितियों का उसके मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उसका प्रत्येक कार्य समाज की सीमाओं मैं होता है। समाज की संस्कृति का एक अंग कला है, जिसको समाजपरम्परा के रूप में क्रमशः आगे बढ़ाता रहता है और कला सदैव जीवित रहती है। कलाकार बाह्य जगत के रूप-स्वरूप, गतिविधियों एवं समाज की भावनाओं से सम्बन्ध बनाकर ही सृजन किया करता है। वह अपने सृजन में सामाजिक भावनाओं का चित्रण करता है वास्त...

kala sanskriti aur bajar

कला संस्कृति एवं बाजार दिलीप कुमार दृश्यकला विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय         देश की गौरवमय परम्परा एवं महत्व का निर्धारण उस देश की संस्कृति द्वारा होता है। कला सत्य एवं सौन्दर्य का सृजन करती हुई, सत्यम शिवम सुन्दरम की अवधारण को साकार करती है। सांस्कृतिक व दार्शनिक मूल्यों का निर्वाह करती हुई उस राष्ट्र की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। पृथ्वी पर मानव जीवन के साथ ही कलाओं का उदगम हुआ, जो मानव जीवन के उत्थान-पतन के साथ तालमेल बनाते हुए, प्राचीन सभ्यताओं से होकर आधुनिकता के द्वार तक पहुंची है, जो अपने अन्दर हजारो वर्षों के ज्ञान, दर्शन, एंव सामाजिक, भौगोलिक परिवेश को समाहित किये हुए है। मानव अपनी अभिव्यक्ति के लिए विविध आयामो और सम्भावनाओं के विकाश के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा, जो उसे सुन्दर, सभ्य और प्रगतिपथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। कलाकार के विषय में दार्शनिक मूल्यों, सामाजिक सरोकार के अपनी संवेदनाओं की कसौटी पर रखकर मस्तिष्क से मंथन कर एक श्रेष्ट विचार को जन्म देता है, एंव विषय पर अपनी सूक्ष्म संवेदनाओं को भी अभिव्यक्ति प्रदान करता है। समय परिवर्तन ...

Clay art

Where can we use clay in fine arts? ganesh clay art Fine art/ ललित कला    ललित कलाएं पांच प्रकार की होती हैं 1 काव्य कला  2संगीत कला  3 चित्रकला  3 मूर्तिकला 5 स्थापत्य कला terracotta art           ललित कलाओं में मूर्तिकला चौथे नंबर पर आती है मूर्तिकला निर्माण के लिए परंपरागत रूप से लकड़ी, धातु, मिट्टी, पत्थर एवं मोम का प्रयोग किया जाता था वर्तमान में मूर्तिकला के निर्माण में कई माध्यमों की खोज हुई है फिर भी मिट्टी का अपना महत्व है सीखने के लिए युवा कलाकारों द्वारा अभ्यास मिट्टी के द्वारा ही किया जाता है हमारे त्योहारों के अवसरों पर भी मिट्टी की बनी हुई मूर्तियां घरों में लाई जाती हैं तथा स्वयं भी प्रतीकात्मक रूप में मूर्ति निर्मित की जाती है मूर्ति कला में मिट्टी का प्रयोग हम कलाओं में मिट्टी का प्रयोग निम्नलिखित रुप से कर सकते हैं मूर्ति के निर्माण में खिलौनों के निर्माण में ईटों के निर्माण में  बर्तनों के निर्माण में मिट्टी के फलक पर रिलीफ मूर्ति के रूप में     earthen ware            मिट्ट...

करवा चौथ और लोक कलाओं का अद्भुत संसार

करवा चौथ और लोक कलाओं का अद्भुत संसार करवा चौथ की पूजा में प्रयोग होने वाली सींके            भारत उत्सवधर्मी देश है जहां पर प्रत्येक मास में कोई न कोई तीज त्यौहार अवश्य होता है इन अवसरों पर घरों को विशेष रुप से अलंकृत और सुसज्जित किया जाता है आस्था एवं विश्वास को मूर्त रूप देने के लिए कुछ चित्रों का निर्माण किया जाता है जो हमारी लोककला का प्रतिनिधित्व करते हैं जो परंपरा मुख्य रूप से परिवार की स्त्रियों द्वारा ही आगे बढ़ाई जा रही है जो किसी संस्थान में जाकर कलाकारी नहीं सीखाती हैं फिर भी उन्हें अपनी विरासत से चित्रण का अद्भुत कौशल प्राप्त होता है वैसे तो यह चित्र प्रतीक या किसी कहानी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उस त्यौहार की मूल आत्मा होती है सभी लोग इन्हीं को उस शक्ति का स्वरूप मानकर पूजा अर्चना करती हैं जो उनके कुल समाज परिवार की रक्षा और समृद्धि प्रदान करती है       करवा चौथ हमारे देश का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को मनाया जाता है इस अवसर पर सुहागन स्त्रियां व्रत रखती है यह त्यौहार उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश...

गुरु के सम्मान में दो शब्द

      गुरु अनगढ़ आकार को गढ़कर प्रेम करुणा  दया आदि मानवीय गुणों से पूर्ण करता है गुरु जीवन के कुछ हिस्से में ही संपूर्ण जीवन के लिए व्यक्ति को तैयार करता है गुरु ही मात्र वर्तमान में रहते हुए आने वाले भविष्य के लिए हमें तैयार करता है इसीलिए उसे भविष्यदृष्टा भी कहा जाता है दूसरे शब्दों में अगर हम कहें तो गुरु शरीर रूपी कंप्यूटर में गुणों का सॉफ्टवेयर इंस्टॉल कर उसे संचालन के योग्य बनाता है       मानव जीवन मैं केवल दो व्यक्ति ऐसे होते हैं जो अपने से आगे बढ़ता हुआ अपने शिष्य को देखना चाहते हैं पहला माता पिता दूसरा गुरु, गुरु निस्वार्थ होकर बालक के व्यक्तित्व के विकास में लगा रहता है वह भली भांति जानता है कि उसका प्रतिफल केवल उस व्यक्ति तक नहीं सीमित रहेगा जिसको वह शिक्षा प्रदान कर रहा है बल्कि वह तो भविष्य में समृद्ध समाज की नीव रखने वाली पौध को तैयार कर रहा है       जब हम अपने कैरियर के शिखर पर होते हैं तब समाज का प्रत्येक वर्ग आपको जानता और पहचानता है फिर भी जब कभी आप समस्या से स्वयं को घिरा हुआ पाते हैं तो उसका स...

मानवीय संवेदना का बदलता स्वरुप

   संवेदना या भाव इन शब्दों से अक्सर हम आप रोज किसी न किसी रूप में रूबरू होते हैं पर कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं घटित हो जाती हैं जिनको देखकर इनके मायने मात्र छलावा प्रतित होते है जरा सी कल्पना करिए और देखें मानव समाज के अलावा भला और कौन है जो इन शब्दों को गढ़ता हो और इनके अर्थों को समझता हो फिर भी मानव को छोड़कर सारे जीव जंतु यहां तक प्रकृति भी कहीं ना कहीं इन शब्दों के वास्तविक अर्थ को ग्रहण करते हुए अपने अपने हिस्से का कर्तव्य निर्वाहन कर रही हैं पर मानव की जहां पर बात आती है वह अपना रंग गिरगिट के सामान बदल लेता है      मनुष्य इस धरा का सबसे बुद्धिमान प्राणी है अतः अपने बचाव के लिए कोई ना कोई उपाय अवश्य खोज लेगा इसीलिए भावों के भी कई रूप गिनाए गए उन्हीं में से एक है क्रूरता या वीभत्स केरल की यह घटना इस भाव का एक उदाहरण है एक भूख प्यास से व्याकुल हाथी केवल अपनी भूख को शांत करने के लिए इधर उधर भटक ही रहा था कि किसी ने उसे पटाखों से भरी खाद्य सामग्री खाने के लिए दे दी वह फट गए जिससे हाथी की दुखद मृत्यु हो गई मृत्यु से पहले घायल हाथी ने किसी मानव को कोई कष्ट नही...

कोरोना और कला

कोरोना और कला         कहते हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है यह संदर्भ वर्तमान परिस्थितियों पर अक्षरशः सत्य प्रतीत होता है आज देश ही नहीं वरन संपूर्ण संसार कोरोना नामक भयंकर महामारी से ग्रसित है इस मानवीय आपदा ने स्थापित जीवन के सभी मूल्यों पर विराम लगा दिया है अब पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों ने हमारे सम्मुख अलग प्रकार की चुनौतियों को जन्म दिया है वैसे तो हर प्रकार की चुनौतियां मानव समाज को नित्य  विकास के लिए नए आयामों के द्वार खोलती आई हैं पर वर्तमान स्थिति का समाधान भी विकास के नए द्वार खोलेगा इसमें कोई संशय नहीं है फिर भी यह चुनौती मानव इतिहास के कुछ गिने-चुने उदाहरणों में से एक ही है इस समय सारा देश लॉक डाउन में है जिससे लोग अपने घरों में कैद होकर रह गए हैं देश का एक बड़ा भाग धीरे धीरे अवसाद की तरफ भी जाने लगेगा यहीं पर कलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है       कला मानव के चरित्र निर्माण में अहम भूमिका निभाती है जीवन को हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण कर देती है प्रत्येक मनुष्य के अंदर कोई ना कोई विशेष कल...

गणतंत्र दिवस पर कुछ खास करें

        गणतंत्र दिवस तिरंगा  तिरंगा                                   सूरज हर दिन निकलता है पर आज का कुछ खास था खास इसलिए क्योंकि आज के दिन ही हमारे देश का संविधान लागू हुआ था 26 जनवरी के इस पावन पर्व को हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं गणतंत्र का अर्थ है प्रजातंत्र लोकतंत्र या जनतंत्र है साधारण शब्दों में हम लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कह सकते हैं कि देश में जनता का शासन हो या उसके द्वारा निर्वाचित लोग देश को प्रगति पथ पर आगे बढ़ाएं पर यही सबसे महत्वपूर्ण तथ्य भी है जनता किसी गणतंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी है देश किस दिशा में जाएगा यह केवल कोई राजनेता नहीं निर्धारित करता बल्कि उस राष्ट्र के आम लोग निर्धारित करते हैं अतः हमें व्यक्तिगत रूप से लगता है कि राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को आत्मचिंतन करना चाहिए क्या हम सब अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वाहन कर पा रहे हैं या नहीं पर इतना सारे देशवासियों को हमेशा बोध रखना चाहिए लोकतंत्र की असली शक्ति आपके पास है ...

मन की बात

  मन  विषाद               मन कितना सुंदर शब्द है हो भी क्यों ना कहते हैं मन चंचल यानी गतिशील है अधिकांश विद्वान मानते हैं जो वस्तुएं गतिशील हैं वह सुंदर होती है इसी दृष्टि से मन भी सुंदर होगा ऐसा मुझे लगता है पर जो चंचल है वह भला नियंत्रण में कहां रहता है जिस पर हमारे मस्तिष्क का नियंत्रण ना हो उस पर उचित अनुचित जैसे शब्दों का प्रयोग का मतलब ही क्या है जब बारूद में आग लग ही गई तो विस्फोट से क्या डरना कहने का आशय यह है कि विस्फोट की मात्रा बारूद की मात्रा पर निर्भर करती है ठीक उसी प्रकार हमारी रुचि या मनोभाव निर्धारित करते हैं कि मन कितना और कहां पर चंचल होता है यहां पर मन को मैं समाज में जिस व्यवहार की स्थिति में योग होता है उसी के अर्थ में कर रहा हूं यह स्पष्ट करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि शब्दकोश या किसी परिभाषा के अनुसार इसका वास्तविक मस्तिष्क से जोड़ा जाता है            मन हमारे भावों का ही एक रूप है जो यह दर्शाता है कि उक्त वस्तु से हमारा संबंध कैसा होगा कई बार हम चाहते हैं कि इस अमुक कार...

शब्द और चित्र संवाद के माध्यम

     शब्द और चित्र दोनों अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है दोनों के द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं दोनों ही प्राचीन काल से संप्रेषण के प्रमुख स्वरूप रहे हैं पर शब्द और चित्र दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं और संभावनाएं हैं दोनों का कार्य एक जैसा है पर दोनों एक जैसे दिखते हुए भी बहुत अलग अलग नजर आते हैं      शब्दों के मेल को या धाराप्रवाह को भाषा का नाम देते हैं  प्रत्येक भाषा शब्दों  के योग का ही परिणाम होती है यहीं पर शाब्दिक संचार का स्वरूप या संप्रेषण की सीमाएं दम तोड़ने लगती हैं भाषा किसी क्षेत्र तक ही स्वीकार होती है बल्कि उससे जाने जानने वालों तक ही को जोड़ती है उदाहरण के लिए हिंदी भाषा के जानने वाले लोग अगर अन्य भाषा को नहीं जानते तो दूसरी भाषा का साहित्यक संवाद अथवा व्याख्यान जितना भी सशक्त हो वह उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगा अर्थात उनकी समझ के बाहर की बात होगी भाषा की भिन्नता भले ही संचार में बाधक बनती है पर भाषाओं का सहयोग भी एक दूसरे के लिए वरदान सिद्ध होता है उन्हें नए शब्दों का उपहार प्रदान करती हैं    ...

वर्तमान कला की दशा एवं दिशा (ललित कला विभाग कानपुर विश्वविद्यालय के कैम्प के संदर्भ में )

               आयोजन शब्द कितना सार्थक सन्दर्भ प्रस्तुत करता है जो अपने साथ नई अभिलाषा आशा और उमंग लेकर आता है उमंग ही मानव जीवन को गतिशील और विकास के पथ पर आगे बढ़ाती है तथा आने वाले समय में उसके सम्मुख आने वाली चुनौतियों को सरल करने में प्रेरणा का भी कार्य करती है पर हमें इसके दूसरे पक्ष को भी ध्यान रखना आवश्यक है जो केवल आवश्यक ही नहीं अपितु विकास के लिए महत्वपूर्ण भी है किसी समारोह की सफलता उसके उद्देश्यों में निहित होती है आयोजन के समाप्त होने के बाद एक शैल्य चिकित्सक की भांति उसमें से अच्छे बिंदुओं को गिनना बहुत आवश्यक है पर जो चीजें स्वयं निर्धारित प्रारूप के अनुसार नहीं हो पाई या कुछ कमी रह गई है उन कारणों पर गौर करके भविष्य में सुधार करने का प्रयत्न करें जिससे आप रोग मुक्त हो पाएंगे                इस पृष्ठभूमि भूमि के पश्चात मैं विषय की ओर लौटता हूं कानपुर विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग और राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश की ओर से एक कलाकार कैंप और सेमिनार का आयोजन 14 से 20 नवम्बर के मध्य कि...

संस्थापन कला instalation art

    संस्थापन कला संस्थापन कला अभिव्यक्ति की एक नई विधा है जो कलाकार को अपने कार्य को करने की और अधिक स्वतंत्रता प्रदान करती है इसमें कलाकृति और दर्शक दोनों का पृथक अस्तित्व ना होकर एक पूर्ण कृति का दोनों को मिलाकर निर्माण होता है इसके विपरीत चित्र और मूर्तियों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है जबकि संस्थापन कला  दर्शक के आने पर अपनी सक्रिय अवस्था में आती है यहां पर यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या संस्थापन कला स्वयं कभी सक्रिय नहीं होती बल्कि निष्क्रिय अवस्था में रहती है लेकिन ऐसा सोचना भी गलत होगा संस्थापन कला और मूर्तिकला तथा चित्रकला में एक आधारभूत अंतर है अंतिम दोनों को दर्शक आलोकित कर सकता है पर उसका वह स्वयं हिस्सा नहीं बन पाता है इससे मेरा आशय कृति का स्वयं को अंग मान लेना है कला दीर्घा में जाकर चित्र मूर्तियों को देखने का आनंद तथा कृतियों में निहित संदर्भों और सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है पर  चित्र या मूर्ति में दर्शक को कोई स्थान नहीं मिलता क्योंकि यह दोनों माध्यम दर्शकों के लिए स्थान नहीं छोड़ते इसीलिए मैं कह रहा हूं यह दोनों माध्यम स्वयं में पूर्ण य...