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अक्टूबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अकबर पदमसी

अकबर पदमसी ( Akbar padamsee) "चित्रों का नेत्रों द्वारा आनंद उठाने में ही उसकी सार्थक सार्थक सार्थक सार्थकता है।"                                              अकबर पद्ससी  अकबर पद्मसी (1928-2020) आधुनिक भारतीय कला के सबसे प्रभावशाली और विचारशील कलाकारों में से एक थे। अपने पूरे करियर के दौरान, उन्होंने प्रयोगधर्मी और व्यक्तिवादी शैली को अपनाते हुए विभिन्न माध्यमों में काम किया।  जीवन और कला प्रारंभिक जीवन और शिक्षा : 12 अप्रैल, 1928 को मुंबई में जन्मे पद्मसी ने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। पेरिस में अध्ययन: 1951 में फ्रांसीसी सरकार से छात्रवृत्ति मिलने के बाद वे पेरिस चले गए, जहाँ वे फॉविस्ट चित्रकारों से प्रभावित हुए। यहाँ उन्होंने अतियथार्थवाद के सह-संस्थापक, लेखक और कवि आंद्रे ब्रेटन से पुरस्कार भी प्राप्त किया। कला में प्रयोग : पद्मसी ने अपने काम में लगातार नए प्रयोग किए। उन्होंने न केवल तेल और चारकोल जैसे पारंपरिक माध्यमों का उपयोग क...

यूपी बोर्ड चित्रकला कला कक्षा 10प्रश्न पत्र

यूपी बोर्ड चित्रकला कला कक्षा 10प्रश्न पत्र  UP board hard question hard question paper class 10 1 - मुख्य रंग कितने है- (A) तीन (B) दो (C) पाँच (D) सात 2- इनमें शीतल (ठण्डा) रंग कौन-सा है ? (A) हरा (B) लाल ( C ) नारंगी (D) पीला 13- निम्न में से कौन सा रंग गरम है ? (A) लाल (B) नीला ( C ) हरा (D) धानी 4- ओस्टवाल्ड चक्र में कितने रंग होते है ? (A) आठ (B) सात ( C ) छः (D) पाँच 5- निम्नलिखित में द्वितीयक रंग कौन-सा है ? (A) नारंगी (B ) लाल (C) पीला (D) नीला 6- तटस्थ रंग कौन-से है ? (A ) सफेद-काला (B) नारंगी - पीला ( C ) लाल-नीला (D) हरा-पीला 7- प्राथमिक अथवा मुख्य रंग कौन- कौन से है ? (A) हरा-आसमानी–पीला  (B) लाल-नीला - पीला  (C) काला - सफेद - भूरा  (D) नारंगी - धानी - आसमानी 8- कौन से रंगों का माध्यम पारदर्शी होता है ? (A ) जल रंग(वॉटर कलर) (B ) तैल रंग  (C) एक्रेलिक रंग (D) पेस्टल रंग 9- सफेद का विरोधी रंग कौन सा है? (A) काला (B ) नीला ( C ) आसमानी (D) नारंगी 10- लाल रंग में नीला रंग मिलाने पर कौन सा रंग बनेगा ?  (A ) बैगनी (B ) आसमानी  ( C ) नारंगी (D...

सुधीर रंजन खास्तगीर

सुधीर रंजन खस्तगीर: भारतीय कला के एक प्रेरणास्रोत सुधीर रंजन खास्तगीर (1907-1974) बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के एक भारतीय चित्रकार, मूर्तिकार और कला शिक्षक थे। उन्हें भारतीय कला में उनके योगदान के लिए 1958 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।  जीवन और शिक्षा जन्म: खास्तगीर का जन्म 1907 में चटगाँव (अब बांग्लादेश में) में हुआ था। शुरुआती जीवन: स्कूली शिक्षा के लिए वे कोलकाता चले गए। एक समय पर, वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के कारण गिरफ्तार भी हुए थे। कला शिक्षा: गिरफ्तारी से रिहाई के बाद, उन्होंने 1929 में नंदलाल बोस के तहत शांतिनिकेतन के कला भवन में ललित कला का अध्ययन किया, जहाँ उन्होंने मूर्तिकला भी सीखी। बाद में, उन्होंने 1933 में मुंबई में मूर्तिकार गणपति काशीनाथ म्हात्रे के स्टूडियो में पत्थर की नक्काशी का प्रशिक्षण लिया।  कलात्मक शैली और विषय अद्वितीय शैली: खास्तगीर को उनकी "भारतीय शैली" की पेंटिंग के लिए जाना जाता था, जिसमें बनावट वाली सतह और मजबूत रैखिक लय होती थी, जो नियो-बंगाल स्कूल की सहज स्वर-शैली से भिन्न थी। विषय-वस्तु: उनकी रचनाओं में भारतीय पौराणिक कथाओं, ग्राम...

महेंद्र पांड्या

महेंद्र पंड्या: भारतीय मूर्तिकला के शिल्पकार मूर्तिकार महेंद्र पांड्या (1926-2015) 20वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण भारतीय मूर्तिकारों में से एक थे, जो अपनी अमूर्त, जैविक और क्यूबिस्ट शैली के लिए जाने जाते थे। उनका कलात्मक सफर पारंपरिक और आधुनिक विचारों का एक उत्कृष्ट मिश्रण था।  प्रारंभिक जीवन और शिक्षा जन्म : महेंद्र पांड्या का जन्म 4 अक्टूबर 1926 को गुजरात के भरूच जिले के इंदौर में हुआ था। शिक्षा : उन्होंने वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय (M.S.U) के ललित कला संकाय से मूर्तिकला में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। बाद में वे इसी विश्वविद्यालय में मूर्तिकला विभाग के डीन भी बने। मृत्यु : लंबी बीमारी के बाद 2015 में 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।  कलात्मक शैली और दृष्टिकोण पांड्या ने कांस्य, पत्थर, लकड़ी, सीमेंट और धातु की चादर जैसे विभिन्न माध्यमों का उपयोग करके अपनी कला का विकास किया। उनकी कला की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:  सामग्री का सम्मान: पांड्या का मानना था कि कलाकार को सामग्री की बनावट और गुणों को समझना चाहिए। उनका उद्देश्य सामग्री के कच्चे और प्...

विनोद बिहारी मुखर्जी

विनोद बिहारी मुखर्जी : एक आधुनिकचित्रकार बिनोद बिहारी मुखर्जी (1904-1980) एक भारतीय कलाकार थे, जिन्हें आधुनिक भारतीय कला के अग्रदूतों में गिना जाता है। वे भित्ति चित्रकला और दृश्य कला में अपनी अनूठी शैली के लिए जाने जाते हैं। उनकी कला में भारतीय संस्कृति, प्रकृति, और मानव जीवन का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। नेत्रहीन होने के बावजूद, उन्होंने अपनी रचनात्मकता और कला के प्रति अपने समर्पण से दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया। भारतीय कला में योगदान बिनोद बिहारी मुखर्जी ने भारतीय कला को एक नई पहचान दी। उन्होंने शांतिनिकेतन में कला भवन में शिक्षा प्राप्त की और बाद में वहीं शिक्षक के रूप में कार्य किया। उन्होंने भारतीय कला के पारंपरिक रूपों को आधुनिक तकनीकों के साथ मिलाकर एक अनूठी शैली विकसित की। उनके भित्ति चित्रों में महाभारत, रामायण, और जातक कथाओं जैसे भारतीय पौराणिक कथाओं के दृश्य चित्रित हैं। उन्होंने ग्रामीण जीवन, प्रकृति, और सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी कला के माध्यम से प्रकाश डाला। अनूठी शैली बिनोद बिहारी मुखर्जी की कला में रेखाओं, रंगों, और आकारों का अद्भुत संयोजन है। वे सरल और स्पष्ट रेखाओं ...

ई वी हैवेल

अर्नेस्ट बिनफील्ड हैवल : भारतीय कला पुनर्जागरण के प्रेरक परिचय अर्नेस्ट बिनफील्ड हावेल (Ernest Binfield Havell, 1861–1934) एक ब्रिटिश कला इतिहासकार, शिक्षक और भारतीय कला के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने भारतीय कला को पश्चिमी दृष्टिकोण से परे जाकर उसकी मौलिकता, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक गहराई के साथ समझने का प्रयास किया। उनके कार्यों ने भारतीय कला के पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारंभिक जीवन और शिक्षा हावेल का जन्म इंग्लैंड में हुआ था। उन्होंने कला और सौंदर्यशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की और प्रारंभिक जीवन में यूरोपीय कला परंपराओं से प्रभावित रहे। बाद में भारत आने के बाद उन्होंने भारतीय कला की विशिष्टता को पहचाना और उसके अध्ययन में गहरी रुचि ली। भारत में योगदान 1896 में हावेल को कलकत्ता आर्ट स्कूल (अब गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट, कोलकाता) का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया। उस समय भारतीय कला शिक्षा पर पश्चिमी प्रभाव हावी था। हावेल ने इस प्रवृत्ति को बदलने का प्रयास किया। उन्होंने भारतीय परंपराओं, लोककला और धार्मिक प्रतीकों को कला शिक्षा में शामिल किया। उनके नेतृत्व में स्कूल ...

हिम्मत शाह

हिम्मत शाह एक प्रसिद्ध भारतीय मूर्तिकार और बहु-विषयक कलाकार थे, जिनका जन्म 1933 में गुजरात के लोथल में हुआ था और निधन 2025 में हुआ। उन्हें भारतीय समकालीन कला के सबसे महत्वपूर्ण कलाकारों में से एक माना जाता है। उनकी कलाकृतियाँ उनके अभिनव प्रयोग और मिट्टी के बर्तनों (टेराकोटा) और कांस्य में मानव सिर जैसी अमूर्त मूर्तियों के लिए जानी जाती हैं।  कलात्मक यात्रा प्रारंभिक शिक्षा: उनका जन्म गुजरात के लोथल में हुआ था, जो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थल था। उन्होंने बचपन में मिट्टी के बर्तनों के काम को करीब से देखा, जिसने उनकी कला को गहरा प्रभावित किया। प्रशिक्षण: उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में ड्राइंग शिक्षक का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद उन्होंने 1956 से 1960 तक बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय में चित्रकला का अध्ययन किया। ग्रुप 1890: वह 'ग्रुप 1890' के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, जिसे 1962 में जे. स्वामीनाथन ने शुरू किया था। पेरिस: 1967 में, उन्हें फ्रांसीसी सरकार की छात्रवृत्ति पर पेरिस में प्रिंटमेकिंग का अध्ययन करने का अवसर मिला। दिल्ल...