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नवंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चाहत में प्रेम बहुत है

चाहत में प्रेम बहुत है देखो तो विश्वास बहुत है प्रेम के इस संगम में  हम दोनों का कल्याण बहुत है//1 अधरों के मिलने में लब्जो का काम नहीं है इस प्रेम की पावन बेला पर अब  मुझको भी इन्कार नहीं है अर्पण करता हूं मैं अब तुझको ही अपनी सांसे मुझको भी अब इनसे प्यार नहीं है//2 देखो चलना है आगे भी मिलकर  राहों से भी कहना है देखेंगे अब आगे बढ़कर  उससे जो मिलकर जो मेल बढ़ा इस बंधन का  देखेंगे अब हम भी इस चाहत में पड़कर//3 यह प्रेम नहीं है उसके आकर्षण का  यह रिश्ता तो है उसके एहसासों का  अब तू साथ चले मेरे दिलवर  प्रेम तो नाम है इक दूजे जा हो जाने का//4 खोना भी पड़ता है प्यार के इस संगम में  गिरना भी पड़ता है साथ में उसके चलने पर  साथी तेरा साथ रहे जीवन भर जीवन भी चलता रहता है उसके रहने पर//5 प्यार में कहती हो बिन तेरे मर जाएंगे  प्यार तो है बंधन है पावन एहसासों का  तुम ही बोलो तेरे बिन हम कैसे रह पाएंगे//6 मिलने की बेला का एहसास बड़ा जरूरी है  अपनेपन का विश्वास दिलाना बड़ा ...

देखो दारू आई है अपने साथ खुशियां लाई है

देखो दारू आई है अपने साथ खुशियां लाई है  बहुत हुआ अब लड़ना भिड़ना आओ मिलकर पीते हैं  अपने टूटे सपनों को मिलकर अब हम सितें  हैं.... तुम विश्वास निराला लाती हो एहसास नया कराती हो  जीवन को भर देती हो नव रंगों से साक्षात स्वर्ग के दर्शन करवाती हो  कितने गुण गाउ तेरे ये समझ नहीं अब आता जब से आई हो मेरे जीवन में तब से जीवन मंद मंद मुस्काता है.. देखो जब तुम आती हो रात सुहानी कर जाती हो  मिल जाता है सब कुछ मुझको पहचान निराली दे जाती हो   देखो दुनिया तुमको झूठा बोले पर मुझको सच्ची लगती हो कोई अपना माने या ना माने पर मुझको तुम अच्छी लगती हो.. जिस महफिल में तेरा आना होता है वहां की शान निराली हो जाती है  रोम रोम खिल जाता है प्यास पुरानी हो जाती है  तेरा मनमोहक यौवन सब पर छा जाता है  जिसको भी देखो बस वो तेरा हो जाता है दुनियादारी छूट गई मेरी अब तुझमें ही डूबा रहता हूं  सांसे जब भी थमने लगती है तुझसे ही खुद को सींचा करता हूं    जब आगे का कुछ नहीं सूझता इन आंखों से  तो तेरी चौखट पर आकर मन्नत मांगा करता हूं... इसको देखा उसको देखा सब...

अमृता शेरगिल

      महिला संघर्षों को नया आयाम देने वाली कलाकार अमृता शेरगिल   ‘ अमृता’ क्या इस नाम को पर्याय कहा जा सकता है ,मानसिक रूप से सशक्त, स्वतंत्र, स्वच्छंद,स्त्री का ? मेरे हिसाब से बिल्कुल।   आज 30 जनवरी अमृता शेरगिल का 108वाँ जन्मदिन। एक चित्रकार कलाकार के रूप में उनका परिचय शब्दों का मोहताज नहीं है ।   स्वयं से प्रेम करना अपनी इच्छा और विचार के साथ जीना ‘अमृता’ का कलाकार होने के अतिरिक्त अन्य पहलू है ,शायद यही पहलू उनकी छोटी सी ज़िंदगी को जीवन दे गया।    क्या ही समर्पण रहा होगा उनका अपने कलाकर्म के प्रति कि 28 वर्ष के छोटे से जीवन में निर्मित कृतियों में वे अमर हो गईं। एक स्त्री और उस पर कलाकार, वे सही मायने में भारत की ‘आधुनिक’ महिला कलाकार थीं। ना केवल कला की दृष्टि से बल्कि विचारों और मूल्यों की दृष्टि से भी। सशक्त, स्वतंत्र , स्वच्छंद   नीना खरे               बुडापेस्ट हंगरी में जन्मी अमृता के पिता उमराव सिंह भारतीय सिख तथा माता मरिया आंत्वानेत हंगेरियन थी इन्हें बाल्यकाल से ही मानव चित्रण मे...

गणेश पाइन 1937-2013

  Artsit Ganesh Pyne    रोमांटिसिज्म कलाकार को जीवित नहीं रखता बल्कि विद्रोही भी बनाता है   गणेश पाइन                      कोलकाता में जन्मे गणेश ने कोलकाता कला विद्यायल से शिक्षा प्राप्त की देश की आजादी के बाद के कलाकारों में अपनी कला शैली  एवं विषयवस्तु से एक अलग पहचान बनाई हैं इस बाजारवादी संस्कृति से अलग अपना जीवन एक सामान्य नागरिक की तरह व्यतीत करते हुए कला को देशज परिप्रेक्ष्य में स्वीकार किया तथा उसको रेखा रंग के बंधन में बंधते हुए दृश्य रूप में वर्तमान सामाजिक स्थिति पर व्यंग  किया गणेश पाइन पर अवनींद्र नाथ पाल क्ली  हाल्स आदि से विशेष रूप से प्रभावित थे एक वार्ता में गणेश पाइन ने कलाकार का आजादी से नाता जोड़ते हुए कहा था अवनींद्र नाथ द्वारा निर्मित भारत माता के चित्र बंगाल में सक्रिय रुप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया इसी प्रकार पिकासो का नाजियों द्वारा किए जा रहे अत्याचार के खिलाफ चित्र बनाकर अपना विरोध प्रकट किया जन्म   11 जून 1937 kolkata मृत्यु    12 मार्च ...

भूपेन खखर 1934-2003

चित्रकार  भूपेन खखर Bhupen Khakhar                 भूपेन खखर Bhupen Khakhar का जन्म मुंबई में 1934 ईस्वी में हुआ था मुंबई तथा बड़ौदा में इन्होंने कला शिक्षा प्राप्त की यहीं पर अपना कार्य स्वतंत्र रूप से प्रारंभ कर दिया इनके चित्रों का विषय मध्यम वर्ग का दैनिक जीवन रहा है इनकी गणना व्यवसायिक चित्रकार के रूप में होती है तथा इन्हें आधुनिक भारतीय पॉप कलाकार की संज्ञा दी गई है इन्होंने अपने चित्रों में लोग प्रिय छपे रूपों तथा कैलेंडर चित्रों को कोलाज की भांति चिपकाकर चित्र सर्जन में प्रयोग किया जिनमें लिपि लेखन भी हुआ है        भूपेन खखर ने समाज के सामान्य जन जीवन से संबंधित विषयों को चुना देखने में विषय साधारण और सरल से प्रतीत होते हैं पर कलाकार ने इन्हीं साधारण सरल दृश्यों को इस प्रकार संयोजित किया है देखने पर वह तीव्र और प्रखर प्रतिक्रिया देती हैं जो सीधे हृदय में जाकर आघात करते हैं कलाकार व्यंग शैली ने विषय को और अधिक सबल बनाया है भूपेन  खखर -  प्लास्टिक के फूलों के साथ आदमी           ...

के के हेब्बार 1912 1996

के के हेब्बार 1912 1996(k k Hebbar) The time has passed for artist to be patronised. They must now have a standing of their own.     अर्थात्  कलाकारों को संरक्षण देने का समय बीत गया है उन्हें अब स्वयं के बूते खड़ा होना चाहिए                                              Rickshaw Puller.Oil on Canvas         कर्नाटक के केट्टीगेरी  गांव में जन्मे (Kettingeri Krishna Hebbar )हैब्बर ने मुम्बई कला स्कूल तथा पेरिस की कला अकादमी से शिक्षा प्राप्त की तथा मुंबई कला विद्यालय में अध्यापन भी किया है ये  अमृता शेरगिल की चित्रकला से विशेष प्रभावित थे साथ ही यूरोपीय चित्रकार पाल गागिन के शैलीगत तत्वों से भी अत्यधिक प्रभावित हुए इनके आरंभिक चित्र केवल गतिपूर्ण रेखांकन के माध्यम से अंकित किए गए हैं जिसके लिए हुए वह विशेष प्रसिद्ध हुए  किंतु बाद में इन्होंने अमूर्त चित्रों का निर्माण प्रारंभ किया एक भित्ति  चित्रकार के रूप में भी...

satish gujral 1925

     भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के भाई सतीश कुमार गुजराल का जन्म पश्चिमी पंजाब प्रांत में 1925 में हुआ था जो अब झेलम पाकिस्तान में पड़ता है 10 वर्ष की अवस्था में बीमारी वस उन्होंने सुनने की अपनी सामर्थ्य को दी थी किंतु कठिन परिश्रम और आत्मविश्वास से इन्होंने लाहौर मुंबई मैक्सिको से कला का अध्ययन कर स्वयं को कला जगत में एक प्रतिष्ठित कलाकार के रूप में स्थापित किया इन्हें  मनःस्थिति का कलाकार भी कहा जाता है सतीश गुजराल ने  चित्रण की अपेक्षा म्यूरल कोलाज में अपना समय अधिक दिया तथा न्यूरल के दृष्टि से इन्हें भारत के सर्वोच्च कलाकारों में गिने जाते हैं इन्होंने जलाई गई लकड़ी तथा विद्युत प्रकाश के प्रभाव से धातु की तख्तियों पर नवीन रूपों का सृजन किया तथा प्राचीन तांत्रिक प्रवृत्तियों पाप आर्ट से प्रेरित होकर शिरेमिक ब्रांज टाइल्स बाटिक तथा एलुमिनियम द्वारा कोलाज चित्रों तथा शिल्पों का सृजन किया गुजराल साहब अपने म्यूराल चित्रों में अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों का भी प्रयोग करते थे    सतीश गुजराल एक बहु प्रतिभा संपन्न कलाकार थे जो चित्रकल...

भावेश सान्याल 1901-2003

mountainscape by B C  सान्याल    Bhavesh Chandra Sanyal B C sanyal   असम में जन्मे भावेश सान्याल ने कोलकाता स्कूल ऑफ आर्ट से कला शिक्षा प्राप्त की तथा लाहौर को अपना सृजन केंद्र बनाया चित्रकार के साथ-साथ वह मूर्तिकार भी थे किंतु चित्रकार के लिए अधिक ख्याति प्राप्त हुई वह गांधी जी से जुड़कर असहयोग आंदोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया तथा 1929 में लाहौर अधिवेशन में लाला लाजपत राय की एक मूर्ति का भी निर्माण किया वह लाहौर के स्कूल ऑफ आर्ट के प्राचार्य भी रहे तथा वहीं पर स्वयं का कला स्टूडियो बनाया जो सान्याल स्टूडियों के नाम से जाना गया जन्म - 22 अप्रैल 1901, धुबरी, असम मृत्यु - 22 अगस्त 2003, दिल्ली शिक्षा- गवर्नमेंट कॉलेज आर्ट ऑफ क्राफ्ट, कोलकाता  प्रसिद्धि - चित्रकार, मूर्तिकार, कला अध्यापक पुरा नाम - भावेश चंद्र सान्याल     स्वतंत्रता के पश्चात सान्याल जी दिल्ली आकर बस गए उन्होंने दिल्ली के पॉलिटेक्निक स्कूल के अध्यक्ष पद पर कार्य किया कुछ समय के लिए नेपाल के शिक्षा सलाहकार भी रहे राज्य ललित कला अकादमी के सचिव पद पर भी कार्य क...

बाल दिवस

     आज बाल दिवस है जैसा कि सभी को विदित है इस दिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के वात्सल्य प्रेम अर्थात बच्चों के प्रति प्रगाढ़ प्रेम के कारण उनके जन्मदिवस को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है भले ही आज जवाहरलाल नेहरू इतिहास में एक पात्र के रूप में दर्ज हैं पर उनका अगाध बाल प्रेम उनके व्यक्तित्व कि स्नेहशिलता स्वीकार्यता समानता आदि भावों के कारण आज भी पूर्णरूपेण प्रासंगिक बनी हुई है भले ही कुछ लोग उनके राजनीतिक एवं अन्य प्रकार के प्रकरणों के आधार पर उनकी आलोचना करते रहे हो पर इस प्रश्न में उन पर कोई आरोप नहीं लगा पाया मैं यहां पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के गुणों की प्रशंसा करने नहीं बैठा मेरा कार्य उनके प्रति श्रद्धांजलि देना मात्र था जो मैंने प्रस्तावना में भूमिका के आधार पर दे दी है अब मैं इस दिवस की वर्तमान परिस्थितियों पर समालोचनात्मक रूप से विचार करूंगा      मेरा हमेशा इस बात पर जोर रहता है केवल किसी तिथि को किसी खास मकसद से नामित कर देने से लक्ष्य प्राप्त नहीं होते इस पर हमेशा से रहा है हो सकता है मैं गलत हूं पर इस संदर्भ में इतिहासिक व...

लम्हें

हमारी क्या खता है कोई हमको तो समझा दे मैंने तो मांगा था साथ उसका देना ना देना उसका फैसला होता अगर कोई फैसले को बदल दे तो इसमें मेरी क्या खता है  कोई तो हमको बता दे..... मुलाकातों का दौर शुरू ही हुआ था  तुम जाने की बात करते हो  अभी तो घर बनाया था  तुम उजाड़ने की बात करते हो चाहत उसे भी है पर हौसला नहीं है । ये उसकी बेबसी नहीं संस्कारों का सिला है                        वो बिखर कर भी खुद को समेटे हुए हैं                             उनके यहां दुनिया को दिखाने का सिलसिला नहीं है.... हम तो रंगों के पुजारी थे शब्दों ने ना जाने कहां से अपना बना लिया भरना चाहते थे रंगों से उसे पर ना जाने क्यों जिंदगी ने बेगाना बना दिया  ... जब गिरोगे तो चलना आ ही जाएगा कब तक हाथ पकड़ कर चलोगे किसी का जब कोई छोड़ देगा हाथ तुम्हारा तो दौड़ना आ ही जाएगा.. सपने भी आएंगे वो भी आएंगे आंख बंद करके तो देख मेरे दोस्त...

कला और धर्म -Art and religion

     कला और धर्म       कला मानव संस्कृति को समृद्ध स्वरूप प्रदान करती हैं और सदैव उसके सुंदर सरल रूपों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करती हैं तो धर्म मानव को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से सबल बनाता है जीवन को अनुशासन प्रदान करता है कलाओं ने भी धर्म के इसी अनुशासन को स्वीकार किया है कला और धर्म दोनों काफी समय तक साथ-साथ चलें और एक दूसरे की प्रगति में सहायक बने।         धर्म ने कलाओं के लिए उचित मार्ग प्रशस्त किया जिन पर चढ़कर कराएं अपने निजी शुरू को प्राप्त करती हैं कलाओं ने भी धर्म की बढ़-चढ़कर सेवा की जो आज विभिन्न रूपों में हमें दिखाई देती हैं जैसे अजंता एलोरा जोगीमरा आदि भारत की नहीं वरन यूरोप के कई देशों में भी ऐसी ही परंपरा विद्यमान है जहां पर कला ने धार्मिक स्थलों को दिव्यता प्रदान करने के लिए अपने विविध रूपों में प्रकट हुई यूरोप में कई प्रकार की स्थापत्य शैलियां तथा  चित्रकला की विविध शैलियां देखी गई जिनका संबंध प्रत्यक्ष रूप से धर्म से रहा है         भारतीय कला के संदर्भ में कई विद्वान तो यहां तक कहते हैं...

रविंद्र नाथ टैगोर (7मार्च 1981- 1941)

           रविंद्र नाथ टैगोर (7मार्च 1861- 1941)           रविंद्र नाथ टैगोर का जन्म जोड़ोसंको पश्चिम बंगाल में हुआ था इनके पिता का नाम देवेंद्र ठाकुर था यह उच्च कोटि के साहित्यकार होने के साथ-साथ नाटककार उपन्यासकार संगीतज्ञ दार्शनिक अभिनेता एवं चित्रकार आदि विधाओं में पारंगत थे 1921 में उन्होंने कोलकाता में शांति निकेतन की स्थापना की तथा 1913 में इन्हें अपनी कृति गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला 1919 में शांतिनिकेतन में कला भवन की स्थापना की जिसका अध्यक्ष नंदलाल बोस को नियुक्त किया 1926 में यूरोप यात्रा के दौरान  इनका  झुकाव चित्रकला के प्रति हुआ यहीं पर इन्होंने चित्रकला को देखा और समझा 67 वर्ष की अवस्था में इन्होंने लेखन बंद कर चित्रण कार्य प्रारंभ किया इनकी कला शैली समन्वयात्मक कही जाती है       टैगोर को भारत में आधुनिक अमूर्तकला का जन्मदाता तथा आधुनिक भारत का प्रथम अंतरराष्ट्रीय चित्रकार कहा गया है इनके आरंभिक चित्र पेन स्याही आदि से बने हैं जो काल्पनिक जानवरों...

तुम्हारे हैं सनम

हम स्वयं के नहीं तुम्हारे हैं सनम तुम्हारी कसम तुम्हारे हैं सनम दिन भर चाहे जितना घूम ले हम थक हारकर शाम को तुम्हारे ही पास आना है तुम्हारी कसम तुम्हारे हैं सनम शक की नजर से ...