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laghu chitran ki vidhi

लघु चित्रण की तकनीक और सामग्री  miniature painting method and material राधा कृष्ण काँगड़ा शैली अजन्ता, बाघ आदि के भित्ति चित्रों के बाद भारत में 9वीं शती में पाल व जैन शैलियाँ आरम्भ हुई । जिनमें ताड़ पत्रों पर छोटे चित्र बनाए गये। बाद में यह चित्र कागज के ऊपर भी बनाये गये। राजस्थानी शैली, पहाड़ी शैली, मुगल शैली और समकालीन शैलियों में कागज (वसली) पर बनाये गये लघु चित्रों की परम्परा का ही विकास हुआ। इस प्रकार भारत में लघु चित्रों का प्रारम्भ जैन एवं अपभ्रंश शैली के चित्रों से माना जाता है। मध्यकाल (15वीं से 18वीं सदी) भारतीय लघु चित्रण का स्वर्णिम काल था जिसमें मुग़ल, राजपूत एवं पहाड़ी आदि शैलियाँ सम्मिलित हैं। राजस्थान में मेवाड़, मारवाड़, कोटा, बूँदी, जयपुर एवं किशनगढ़ आदि क्षेत्रों में लघु चित्र परम्परा विकसित हुई। प्रारम्भ में लघु चित्र ताड़ पत्रों के ऊपर चित्रित किये गये। जिनमें रंगों का प्रयोग हुआ। कालान्तर में लघु चित्रों को मुख्यतः 'वसली' पर बनाया जाने लगाताकि ये लम्बे समय तक स्थाई रह सके कागज तैयार करने की सामग्री एवं उपकरण  1 वसली वसली वास्तव में हाथ से...

Madhubani lok kala

  मधुवनी चित्रकला     भारत की लोककला में मधुवनी चित्रकला अति प्राचीन चित्रकला है। इस कला के चित्रों में रामायण युग से सीता एवं राम के जीवन में घटित घटनाओं का चित्रण प्रमुख होता रहा है। इसमें अधिक से अधिक चटक रंगों का व्यवहार होता रहा है। इस शैली के चित्रों में मानव आकृति चित्रित करने में शारीरिक अनुपात को आधार नहीं बनाया गया है। यों तो प्रत्येक लोककला में यही बात रही है। इस कला का प्राचीनतम वर्णन रामायण में मिलता है। रामचन्द्र जी के स्वागत में मिथिला के आंगन, दालान, चौबारे और घर नाना प्रकार के मोहक प्रतीक चिह्नों से चित्रित किये गये थे । इस कला की पौराणिकता का बोध कर्मकांड से भी होता है। मिथिला में प्रचलित जितने प्रकार के कर्मकांड होते हैं, सभी में किसी न किसी प्रकार का चित्र प्रतीक रूप में विद्यमान रहता है। एक ही तरह के संस्कार के लिए स्त्री एवं पुरुष के अलग अलग तरह के प्रतीक चिह्न बनाये जाते हैं। इसमें एक तोता, एक मछली, एक आम, एक तलवार, एक स्त्री एवं एक पुरुष का चित्रण प्रतीक रूप में होता है । चितेरियां अपने इष्ट देव के प्रति समर्पण के भाव से बनाती हैं। वास्तव में यह क...

सौंदर्य क्या है

सौंदर्य किसे कहते हैं इस विषय पर भी क लावादियों और उपयोगिता वादियों में गहरा मतभेद रहा। पुरातन आदर्शवादियों के लिए यह 'परम तत्व तक ले जाने का मार्ग' या 'सृष्टि में एक सुचालित व्यवस्था' है । उधर कलावादी हरबर्ट के अनुसार, "सौन्दर्य क्या है, कुछ नहीं, केवल जो वह है- सौन्दर्य"! सौन्दर्यानुभूति में सम्बन्धों की पूरी समझ आ जाती है और सौन्दर्यबोध का सही निर्णय संभव होता है।  अब कला में कई धाराएं प्रवेश कर गईं, इसमें सौन्दर्य--योग्यं गुणों पर अधिक बल दिया जाने लगा, और इस प्रकार कला-वस्तु चीर-फाड़ कर बारीक निरीक्षण के योग्य बन गई। यह बौद्धिक विलास का साधन बन कर, कलाकार के स्टूडियो से अध्ययन-कक्ष या प्रयोगशाला में पहुँच गई। इस रूपाकार सिद्धान्त के अनुयायियों ने सौन्दर्यबोध में एन्द्रियक तत्व और अर्थ दोनों का अनदेखा किया। कला-वस्तु का विश्लेषण करके कला के उच्चतम नियम “कला-वस्तु एक आविभाज्य इकाई है" को भी नहीं माना। 19वीं शताब्दी का अन्तिम काल कट्टर विज्ञान का युग था। यहां वैज्ञानिक चीर-फाड़ का ही बोलबाला था। तभी इस युग के लिए कहा गया- “मन के बिना मनोविज्ञान” “सौन्दर...