लघु चित्रण की तकनीक और सामग्री
miniature painting method and material
अजन्ता, बाघ आदि के भित्ति चित्रों के बाद भारत में 9वीं शती में पाल व जैन शैलियाँ आरम्भ हुई । जिनमें ताड़ पत्रों पर छोटे चित्र बनाए गये। बाद में यह चित्र कागज के ऊपर भी बनाये गये। राजस्थानी शैली, पहाड़ी शैली, मुगल शैली और समकालीन शैलियों में कागज (वसली) पर बनाये गये लघु चित्रों की परम्परा का ही विकास हुआ। इस प्रकार भारत में लघु चित्रों का प्रारम्भ जैन एवं अपभ्रंश शैली के चित्रों से माना जाता है। मध्यकाल (15वीं से 18वीं सदी) भारतीय लघु चित्रण का स्वर्णिम काल था जिसमें मुग़ल, राजपूत एवं पहाड़ी आदि शैलियाँ सम्मिलित हैं। राजस्थान में मेवाड़, मारवाड़, कोटा, बूँदी, जयपुर एवं किशनगढ़ आदि क्षेत्रों में लघु चित्र परम्परा विकसित हुई।
कागज तैयार करने की सामग्री एवं उपकरण
1 वसली
2 ब्रश
3 रंग
4 प्रविधि
1. आबीना – केवल जल में ब्रश को भिगोकर रेखांकन करना (सूखे कागज पर पानी की रेखाएँ स्पष्ट होती हैं जो कि चित्र के प्रारूप को निर्धारित करने में सहायता करती है।) आब = जल, बीना = देखना2. खाका = जलीय रेखाओं के आधार पर हल्के लाल रंग से रेखाकंन करना ।3. रंगमेजी = रंग भरना ( इसके भी दो क्रम होते थे )अ - दागीना – चित्र के विविध भागों जैसे आकृति, आकाश,वृक्ष, वनस्पति, वेशभूषा आदि को उसमें लगाये जाने वाले रंगों से चिन्हित करना ।ब- पोतना – ( भरना) - चिन्हित किये गये रंगों से उस भाग में रंगों को भरना ।4. गोलाई – रंगों की हल्की व गहरी तानों से गोलाई उभार दिखाना।5. साया सुसमा – शेडिंगअ- साया = गहरी तानों की रेखाओं से छायांकन का प्रभाव उत्पन्न करना ।ब - सुसमा = विभिन्न रंगों से किसी वस्तु में उभार का प्रभाव उत्पन्न करना।6. सिया कलम – स्याही का प्रयोग चित्र में आवश्यकतानुसार स्याही की रेखाओं का प्रयोग करना ।7. गुलापाम्बा आभूषणों में पीले व सफेद रंगों का प्रयोगकरना।8. सुफेदा = आँख के तारे व मोतियों आदि के आभूषणों में गाढ़े सफेद रंग का प्रयोग ।9. ज़रब = चित्रों में बहुमूल्य एवं मध्य बहुमूल्य रत्नों जैसे मोती, माणक, पन्ना आदि का प्रयोग करना, जयपुर शैली के अनेक चित्रों में इस प्रकार के रत्नों का प्रयोग होता है।
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