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Madhubani lok kala

  मधुवनी चित्रकला

    भारत की लोककला में मधुवनी चित्रकला अति प्राचीन चित्रकला है। इस कला के चित्रों में रामायण युग से सीता एवं राम के जीवन में घटित घटनाओं का चित्रण प्रमुख होता रहा है। इसमें अधिक से अधिक चटक रंगों का व्यवहार होता रहा है। इस शैली के चित्रों में मानव आकृति चित्रित करने में शारीरिक अनुपात को आधार नहीं बनाया गया है। यों तो प्रत्येक लोककला में यही बात रही है।

इस कला का प्राचीनतम वर्णन रामायण में मिलता है। रामचन्द्र जी के स्वागत में मिथिला के आंगन, दालान, चौबारे और घर नाना प्रकार के मोहक प्रतीक चिह्नों से चित्रित किये गये थे। इस कला की पौराणिकता का बोध कर्मकांड से भी होता है। मिथिला में प्रचलित जितने प्रकार के कर्मकांड होते हैं, सभी में किसी न किसी प्रकार का चित्र प्रतीक रूप में विद्यमान रहता है। एक ही तरह के संस्कार के लिए स्त्री एवं पुरुष के अलग अलग तरह के प्रतीक चिह्न बनाये जाते हैं। इसमें एक तोता, एक मछली, एक आम, एक तलवार, एक स्त्री एवं एक पुरुष का चित्रण प्रतीक रूप में होता है। चितेरियां अपने इष्ट देव के प्रति समर्पण के भाव से बनाती हैं।

वास्तव में यह कला मिथिला की लोककला के रूप में आरंभ हुई और आज भी इसकी गणना लोककला के ही अंतर्गत की जाती है। इस कला के चित्रकार मधुबनी क्षेत्र में रहे हैं, जिसके कारण इस कला का नाम मधुबनी चित्रकला के नाम से विख्यात हुआ।

आरंभ में इस कला का चित्रण केवल दीवार या भूमि पर ही किया जाता था जिसे मात्र महिलाएं ही करती थीं, परंतु अब इस कला का चित्रण काग़ज़, कपड़ा एवं लकड़ी पर होने लगा है। इस कला के जानकार अब काफ़ी मात्रा में पुरुष भी हो गये हैं।


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