सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मन की बात

 

मन 

https://historyoffineartdk.blogspot.com/2020/01/blog-post_21.html

विषाद 

             मन कितना सुंदर शब्द है हो भी क्यों ना कहते हैं मन चंचल यानी गतिशील है अधिकांश विद्वान मानते हैं जो वस्तुएं गतिशील हैं वह सुंदर होती है इसी दृष्टि से मन भी सुंदर होगा ऐसा मुझे लगता है पर जो चंचल है वह भला नियंत्रण में कहां रहता है जिस पर हमारे मस्तिष्क का नियंत्रण ना हो उस पर उचित अनुचित जैसे शब्दों का प्रयोग का मतलब ही क्या है जब बारूद में आग लग ही गई तो विस्फोट से क्या डरना कहने का आशय यह है कि विस्फोट की मात्रा बारूद की मात्रा पर निर्भर करती है ठीक उसी प्रकार हमारी रुचि या मनोभाव निर्धारित करते हैं कि मन कितना और कहां पर चंचल होता है यहां पर मन को मैं समाज में जिस व्यवहार की स्थिति में योग होता है उसी के अर्थ में कर रहा हूं यह स्पष्ट करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि शब्दकोश या किसी परिभाषा के अनुसार इसका वास्तविक मस्तिष्क से जोड़ा जाता है
           मन हमारे भावों का ही एक रूप है जो यह दर्शाता है कि उक्त वस्तु से हमारा संबंध कैसा होगा कई बार हम चाहते हैं कि इस अमुक कार्य को नहीं करूंगा पर मन है कि मानता नहीं इसमें सारा दोष मन का नहीं है मन तो आदतों का गुलाम है जो स्वयं गुलाम हो वह भला दूसरों को कैसे भटका सकता है हमारी आदतें अच्छी बुरी होती हैं वही हमारे मनोभावों को दर्शाती हैं कार्य करने से पहले हम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं कि अमुक कार्य गलत है इसे नहीं करना चाहिए पर हमारी आदतें उस आवाज को दबा देती है और मस्तिष्क को यह आदेश देने पर मजबूर कर देती हैं कि मन हमें उक्त स्थान पर ले जाए
https://historyoffineartdk.blogspot.com/2020/01/blog-post_21.html

मन की कोमलता 

            ईश्वर का हमें धन्यवाद करना चाहिए कि हमें एक ऐसा शरीर दिया है जिससे प्रत्येक कार्य को आसानी से कर सकें ऐसी शक्ति प्रदान की है इसके साथ ही हमें कुछ ऐसा प्रदान किया है जो समस्त जीव धारियों को प्राप्त नहीं है वह है एक प्रगतिशील मस्तिष्क, मनुष्य प्रत्येक कार्य करने से पहले भली-भांति सोच समझकर कार्य करता है पर आप ने इसी समाज में देखा होगा कि बहुत सारे व्यक्ति उचित अनुचित का व्यापक ज्ञान रखते हैं फिर भी अपनी आदतों के गुलाम होते हैं आपने किसी शराबी को देखा है कितना  भी संवेदनशील क्यों ना हो जब उस व्यक्ति को शराब की आवश्यकता महसूस होती है तो वह उसे प्राप्त करने के लिए अपनी अनमोल से अनमोल चीज का बलिदान करने से भी नहीं चूकता ऐसा नहीं है कि उसके अंदर विवेक नहीं है पर उसका मन उस बुरी आदत का गुलाम है इसी कारणवश वह उस समय इच्छा की पूर्ति के अतिरिक्त अन्य किसी भी पक्ष पर विचार नहीं कर पाता बस उसकी तृष्णा शांत होनी चाहिए मूल्य चाहे जो भी हो
https://historyoffineartdk.blogspot.com/2020/01/blog-post_21.html

चिंतन 

            इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति को मस्तिष्क की सत्ता को स्वीकारते हुए भली-भांति सोच विचार कर कार्य करना चाहिए मन तो हमेशा चंचल रहेगा पर उसकी चंचलता को शांत करने के लिए उस पर लगाम लगाना आवश्यक है अगर कोई व्यक्ति ऐसा कर पाए तो निश्चित तौर पर वह श्रेष्ठ बन सकता है यह कार्य कोई असंभव नहीं है न हीं इसके लिए किसी विशेष प्रकार की साधना की आवश्यकता है बस आवश्यकता है तो एक दृढ़ संकल्प की जो व्यक्ति को स्वयं संयमित कर सके और निर्णय लेने के समय अंतः करण को शांत रखते हुए हर प्रकार से परखने की शक्ति प्रदान कर सकें
           प्रत्येक मनुष्य को अपनी आदतों का विकास ऐसा करना चाहिए जो उसके विकास को समर्पित हो किसी अपयश के मार्ग पर न ले जाएं प्रगतिशील आदतें ही मन को प्रगतिशील राहों की तरफ ले जाती है अतः हमें अपने परिवेश को किस प्रकार से जीवंत बनाना चाहिए जो मन को सुंदर सहज सरल आडंबर रहित निश्चल परिवेश की तरफ ले जाए
             मन का अपना अस्तित्व भले ही कहने में स्वतंत्र लगता हूं पर वह कई क्रियाओं का परिणाम होता है जो हमें दिखाई नहीं देती पर इन सभी क्रियाओं को संयमित कर हम मन को शुद्ध कर सकते हैं जो हमें निश्चित रूप से एक उज्जवल भविष्य की तरह ले जाएगा



       

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रागैतिहासिक काल की कला

       प्रागैतिहासिक काल के चित्र ग्राम जीवन, भीमबेटका   नोट  पूर्व इतिहास शब्द का पहला प्रयोग डैनियल विल्सन ने 1851 ई0 में किया था जान लुबाक ने अपनी अपनी पुस्तक प्रागैतिहासिक टाइम्स में  सर्वप्रथम पाषाण काल ​​को विभाजित किया भारत में 1963 ईस्वी में पुरापाषाण कालीन औज़ारों की खोज हुई रॉबर्ट ब्रूस फ़ुट पहले व्यक्ति थी       कला की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, निश्चित रूप से इस विषय में हमारे पास कोई साक्ष्य नहीं है, फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मानव जीवन के साथ ही कलाओं का जन्म हुआ होगा। प्रागैतिहासिक मानव की सभी खोज अचानक से हुई, उदाहरण के लिए आग जलाने की खोज, दो पत्थरों को रगड़ते  हुए हुई। ऐसी ही कला का ज्ञान हुआ। जहां पर हम रहते हैं उन स्थानों पर पैरों एवं क्रिया कलापों के चिन्ह छोड़ते हैं तथा छाया से भी आकृतियां बनती हुई दिखाई पड़ती है,  छाया को देखकर हम उत्सुक हो जाते हैं।   प्रागैतिहासिक काल की कला को तीन भागों में बाँट दिया गया है। 1 पूर्ण पाषाण काल 2 मध्य पाषाण काल 3 उत्तर पाषाण काल   पूर्ण पाषाण काल ...

दीपावली

  दीपावली Child Art (Diwali)                                                दीपावली त्यौहार उत्साह उमंग अभिलाषा सुख शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है ऐसी हमारी मान्यता है इस दिन घरों की सफाई करने के साथ ही दीपों से सजाया जाता है यह सारा दृश्य मन को प्रफुल्लित अवश्य करता है दीपावली मनाने के पीछे धर्म और विज्ञान के अपने-अपने तर्क हैं पर मैं यहां पर इनका उल्लेख करना नहीं चाहता यह तो हर व्यक्ति को पता है यहां पर सवाल दीपावली पर्व के महत्व का है हम इसे क्यों मनाते हैं यह हमारे लिए किस प्रकार उत्थान या आशा का उत्सव हो सकता है दीपावली का पर्व हर साल आता है और आएगा भी पर केवल किसी उत्सव को मना लेने से वह पूर्ण फल देगा ऐसी अभिलाषा करना स्वयं को ठगने जैसा है बल्कि मूल सवालों के उत्तर खोज कर उनको अपने जीवन में पूर्ण नहीं तो आंशिक रूप से जगह जरूर दें जिससे प्रकाश का त्यौहार सच्चे मायने में आशा अभिलाषा का उत्सव बन सके Diwali        ...

पाल चित्र शैली

             पाल शैली Pal Shaili         Pal Shaili  आठवीं सती में प्रारंभ हुई बौद्ध धर्म के अनुसार गोपाल नाम के एक सेनानायक ने 730 ईसवी में एक राजवंश की स्थापना की जो पाल राजवंश के नाम से जाना गया इसके पश्चात इस राजवंश में क्रमशः धर्मपाल देवपाल नारायणपाल महिपाल जैसे महत्वपूर्ण शासक हुए और पाल काल में  कला की भारी उन्नत हुई रामपाल पाल राजवंश का अंतिम शासक था इसको सामंत सेन ने परजित कर इस राज्य पर अधिकार कर लिया         पाल शैली के चित्रों में अजंता शैली की विशेषताएं मिलती हैं या यूं कहें यह जनता शैली की एक विकृति शैली का ही रूप है यहां पर चित्र 22.25 × 2.25 इंच के ताड़पत्र पर बने हैं पोथी में चित्र आयताकार या वर्गाकार अंतराल में अंकित किए गए थे चित्रों का विषय महायान और ब्रजायन बौद्ध ग्रंथों की विषयवस्तु रही है पाल शैली के अधिकांश पोथियां बंगाल बिहार नेपाल आदि केंद्रों पर चित्र की गई ताल पत्रों के मध्य में बने चित्रों का विषय महायान के देवी-देवताओं से संबंधित रहा है जबकि समन्वय पत्रों के दोनो...