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शब्द और चित्र संवाद के माध्यम

     शब्द और चित्र दोनों अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है दोनों के द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं दोनों ही प्राचीन काल से संप्रेषण के प्रमुख स्वरूप रहे हैं पर शब्द और चित्र दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं और संभावनाएं हैं दोनों का कार्य एक जैसा है पर दोनों एक जैसे दिखते हुए भी बहुत अलग अलग नजर आते हैं
     शब्दों के मेल को या धाराप्रवाह को भाषा का नाम देते हैं  प्रत्येक भाषा शब्दों  के योग का ही परिणाम होती है यहीं पर शाब्दिक संचार का स्वरूप या संप्रेषण की सीमाएं दम तोड़ने लगती हैं भाषा किसी क्षेत्र तक ही स्वीकार होती है बल्कि उससे जाने जानने वालों तक ही को जोड़ती है उदाहरण के लिए हिंदी भाषा के जानने वाले लोग अगर अन्य भाषा को नहीं जानते तो दूसरी भाषा का साहित्यक संवाद अथवा व्याख्यान जितना भी सशक्त हो वह उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगा अर्थात उनकी समझ के बाहर की बात होगी भाषा की भिन्नता भले ही संचार में बाधक बनती है पर भाषाओं का सहयोग भी एक दूसरे के लिए वरदान सिद्ध होता है उन्हें नए शब्दों का उपहार प्रदान करती हैं
     शब्द की अपनी शक्ति होती है जो किसी अन्य माध्यम में नहीं पाई जाती शब्द ध्वनि के माध्यम से हमारे तक पहुंचते हैं जहां पर हमारी कर्ण इंद्रियों का कार्य महत्वपूर्ण हो जाता है जब शब्द ध्वनि का रूप धारण कर मुख से निकलती है तो वह सभी के लिए ग्रह्य होता है बस शर्त इतनी है कि वह सभी के कानों तक पहुंच सके
    चित्र और शब्द में यहीं पर एक आधारभूत अंतर दिखाई पड़ता है चित्र शांत होकर संवाद करता है जबकि शब्द में ध्वनि रहती वह अपने आसपास के सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्रभावित करती है जबकि चित्र उन्हीं व्यक्तियों को प्रभावित करता है जो उसे देखते हैं
    चित्र भाव की भाषा है जो सभी के लिए ग्रह्य होती है चाहे वह किसी आयु वर्ग का व्यक्ति क्यों ना हो भाषा की सभी सीमाएं यहां पर समाप्त हो जाती हैं धार्मिक प्रचारकों ने संवाद के इस सहज माध्यम को प्रमुखता के साथ प्रयोग किया है बौद्ध धर्मावलंबियों ने अपने साथ चित्रों को ले जाते थे जिसमें महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं का संकलन किया जाता था जिसे देखकर सामान्य जन उसमें निहित संदेश को ग्रहण कर लेते थे इस प्रकार तत्कालीन प्रचारकों ने भाषा की जटिलता को सरलीकरण की तरफ ले गए और एक मिले-जुले संवाद को आगे बढ़ाया
     जब भाषा का विकास नहीं हुआ था तब आदिमानव ने संचार के लिए विभिन्न प्रकार के चित्रों के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करता था जिसके साक्ष्य हमें मेसोपोटामिया मिस्र आदि समकालीन सभ्यताओं से प्राप्त होते हैं चित्र संवाद का एक सशक्त माध्यम रहा है समय के साथ कई परिवर्तन भी अयें है पर आधुनिक समय में एक बार फिर चित्रों के माध्यम से शाब्दिक जटिलता को सरल करने का प्रयास किया जा रहा है बालकों की पुस्तकों में छोटे छोटे शब्दों के साथ चित्रों का प्रचुरता के साथ प्रयोग किया जाता है जो संवाद करने के कौशल को अधिक प्रखर बनाते हैं
     चित्र और शब्द दोनों ही संवाद के प्राचीन माध्यम रहे हैं दोनों ने मानव को अपने विचारों के संप्रेषण में सहायता प्रदान की है दोनों की अपनी सीमाएं हैं प्राचीन समय से लेकर अब तक हमारे लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं भविष्य में भी संवाद के सशक्त माध्यम बने रहेंगे।
      
      
   
   

टिप्पणियाँ

  1. मित्र अति सुंदर चित्रण किया कि शब्द और चित्र किस प्रकार सशक्त सम्प्रेषण का माध्यम बनते हैं। एक तथ्य बहुत उत्तम रूप से इंगित किया कि शब्द में निहित भावों को उस शब्दनिष्ठ भाषा को जानने वाला ही समझ सकता है जबकि चित्र के भाव सम्प्रेषण में ऐसी कोई सीमा होती है।

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