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कला संस्कृति एवं बाजार


दिलीप कुमार
दृश्यकला विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

        देश की गौरवमय परम्परा एवं महत्व का निर्धारण उस देश की संस्कृति द्वारा होता है। कला सत्य एवं सौन्दर्य का सृजन करती हुई, सत्यम शिवम सुन्दरम की अवधारण को साकार करती है। सांस्कृतिक व दार्शनिक मूल्यों का निर्वाह करती हुई उस राष्ट्र की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। पृथ्वी पर मानव जीवन के साथ ही कलाओं का उदगम हुआ, जो मानव जीवन के उत्थान-पतन के साथ तालमेल बनाते हुए, प्राचीन सभ्यताओं से होकर आधुनिकता के द्वार तक पहुंची है, जो अपने अन्दर हजारो वर्षों के ज्ञान, दर्शन, एंव सामाजिक, भौगोलिक परिवेश को समाहित किये हुए है। मानव अपनी अभिव्यक्ति के लिए विविध आयामो और सम्भावनाओं के विकाश के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा, जो उसे सुन्दर, सभ्य और प्रगतिपथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। कलाकार के विषय में दार्शनिक मूल्यों, सामाजिक सरोकार के अपनी संवेदनाओं की कसौटी पर रखकर मस्तिष्क से मंथन कर एक श्रेष्ट विचार को जन्म देता है, एंव विषय पर अपनी सूक्ष्म संवेदनाओं को भी अभिव्यक्ति प्रदान करता है। समय परिवर्तन शील है, जो निरन्तर परिवर्तित होता है और कलाकार को निरन्तर प्रगति पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। समय के चक्र ने वैज्ञानिक अनुसंधानों को जन्म दिया, जो औद्योगीकरण के रुप में फलीभूत हुआ।



       बाजारीकरण, वैश्वीकरण एवं उपभोक्तावाद का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। पुरानी परम्पराएँ टूट रही थी। नई परम्पराएँ उनका स्थान ग्रहणकर रही थी। इस बदलाव के समय ने कलाकार को भी प्रभावित किया। नवीन परिस्थियों ने उसे प्रयोगवादी बना दिया, अब वह अपनी चित्रकला में ध्यानस्थ होकर नवीन अनुसंधानों से, नवीन रुपाकारो, विविध आयामों व सम्भावनाओं की खोज की। इन सम्भावनाओं ने कलाकार की स्वतंत्रता, संरचनात्मकता तथा माध्यमों की सारी सीमाएँ लाँघ धी। भारत विभिन्न धर्म, विभिन्न मान्यताएँ, भाषागत एंव सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक विविधता वाला देश है। जिसकी आत्मा अनेकता में एकता की भावना का प्रतिनिधित्व करती है। प्रकृति के चित्रपट की त्रिवेणी कला, साहित्य और संगीत।

            मानव सृष्टि के उदगम और विकास की मौन शुरुआत एक विराट सता के दवारा रचे गये प्रकृति चित्रों से हुई। आदिम युग में वाणी-भाषा विहीन मानव ने भावों को चित्रों माध्यम से अभिव्यक्त करने का अनगढ़ प्रयास किया। चित्र ही संसार की हर लिपि के जनक चित्रकला का ही स्वरुप इन चित्रलिपियों का परिवर्तित रुप भाषा, व्याकरण से होकर साहित्य बना। यही कारण है कि चित्रकला, संगीत और साहित्य एक दुसरे के पूरक ही नहीं अन्योन्याश्रित भी हैं। आदि कवियों ने प्रकृति का जो स्वरुप देखा और कल्पित किया, उन विम्बों को शब्दों के माध्यम से रेखांकित किया। चित्र शब्दों के जरिये साहित्य का आधार बने तो साहित्य उसकी प्रतिछाया। यही चित्रकला जब स्वरों में बदलकर में उतरे तो संगीत सजा।

         वास्तव में प्रकृति के विशाल चित्रपट पर किसी विराट सता के सृजन की अभिव्यक्ति ये त्रिवेणी ही हैं - चित्रकला, साहित्य और संगीत। एक ऐसी त्रिवेणी जिसकी धवल में मानव सभ्यता और संस्कृति का संपूर्ण अतीत झलकता है और भविष्य रुप ग्रहण करता है।

 किसी भी जानकारी या सुझाव के लिए kalalekhan@gmail.com पर सम्पर्क करें 

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