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कला और समाज

कला और समाज
Art and society

डा. एस सक्सेना
मानव एक सामाजिक प्राणी है, सामाजिक पर्यावरण के अनुकूल ही उसका व्यवहार विकसित होता है। जन्म से ही उसमें सामाजिक तत्व निश्चित रूप में पाये जाते हैं। शैशवावस्था से ही वह अपने परिवार के सदस्यों के सम्पर्क में रहकर सामाजिक नियमों का अभ्यस्त हो जाता है। बाल्यावस्था में वह अन्य समवयस्क बालकों के साथ क्रीड़ा कलाप में आनन्द प्राप्त करता है। तत्पश्चात् यौवनावस्था में वह कुटुम्ब तथा समाज के अन्य व्यक्तियों के संसर्ग में श्राता है। इस प्रकार आरम्भ से ही व्यक्ति के हृदय-पटल पर प्रत्येक स्थिति में अन्य व्यक्तियों तथा सामूहिक रूप में समाज का संसर्गजन्य प्रभाव हर क्षण पड़ता रहता है। इन सामाजिक परिस्थितियों का उसके मन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। उसका प्रत्येक कार्य समाज की सीमाओं मैं होता है। समाज की संस्कृति का एक अंग कला है, जिसको समाजपरम्परा के रूप में क्रमशः आगे बढ़ाता रहता है और कला सदैव जीवित रहती है।

कलाकार बाह्य जगत के रूप-स्वरूप, गतिविधियों एवं समाज की भावनाओं से सम्बन्ध बनाकर ही सृजन किया करता है। वह अपने सृजन में सामाजिक भावनाओं का चित्रण करता है वास्तव में कलाकार के सृजन में समस्त समाज का चित्र ही प्रतिबिम्बित देखा जा सकता है समाज से ही वह जिन भावनाओं अथवा अनुभवों को ग्रहण करता है, उन्हीं के स्मरण को संजोकर वह अपने चित्रों में रख देता है। कलाकार चित्रण की मूल आत्मा (समाज) को ही अपनी कला कृतियों के रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार कला और समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध दिखलाई पड़ता है। यहाँ यह तथ्य अवश्य ध्यान देने योग्य है। कि मानव की भाववृत्ति आदिकाल से लेकर आज तक एक रूपीय ही रही है। भौगोलिक सीमाओं, सामाजिक बंधनों, राजनैतिक संगठनों एवं अन्य किसी प्रकार के भी बंधनों को वह स्वीकार नहीं करती मानव-भावनायें सर्वत्र एवं सभी परिस्थितियों में एक समान ही रहती हैं और उनकी धुरी समाज ही रहता है। इस प्रकार कला और सामाजिक भावनाओं का मानव वृत्तियों से सीधा सम्बन्ध है । कलात्मक सृजन में इन्हीं भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है, परि णामस्वरूप कला का रूप भी विश्वव्यापी बनता है। कलाकार की प्रतिभा, उसकी प्रात्मशक्ति एवं उसके कलात्मक तत्व, कला के रूप का समाज के स्वरूप और भावनाओं के साथ सामंजस्य जोड़कर, उसको व्यापक रूप प्रदान करते हैं।

कला के अधिकांश विषय तत्कालीन समाज की समस्यायें ही
होती हैं, जिनका अंकन कला का मुख्य उद्देश्य होता है इस उद्देश्य से किये गये उसके सृजन में उसका व्यक्तित्व गौण रूप ग्रहण करलेता है और समाज की आवश्यकताओं का प्रतिबिम्ब उसके सृजन में स्पष्ट झलकता है। पहली स्थिति में कलाकार का उद्देश्य अभिव्यक्तिकरण के माध्यम से केवल आत्मशान्ति प्राप्त करना ही होताहै। आत्मविभोरता की इस स्थिति में उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह स्वयं अपना मार्ग चुनता है, लेकिन वह भी समाज से कभी अलगनहीं हो सकता है। इस स्थिति में उसे अपने लक्ष्य की ओर सजग
रहने की आवश्यकता नहीं रह जाती। किन्तु तकनीकी सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते समय कलाकार के समक्ष दर्शक के आनन्द और ग्रात्मशान्ति का लक्ष्य प्रतिपल रहता है। यह उद्देश्य कलाकार के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। इस लक्ष्य के प्रति सजग रहने के कारण वह आत्मविभोरता की उस स्थिति को प्राप्त करने में असमर्थ रहता है, जो उसे पहली स्थिति में मिला करती है। इस प्रकार पहले सिद्धान्त के आधार पर पहली स्थिति में सृजित कला का रूप शुद्ध और मौलिक होता है, तथा दूसरी स्थिति में लक्ष्यपूर्ति के लिए कला का वह रूप व्यावहारिक बन जाता है एवं मौलिकता उससे बहुत दूर हो जाती है। इसके फलस्वरूप कला के रूप को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अनेकानेक तकनीकों को ग्रहण करना होता है तथा उन्हें शिल्प के रूप में प्रस्तुत करना होता है। शुद्ध और मौलिक कला तथा व्यापारिक और शिल्पकला कला के ये दो रूप इस स्थिति के आधीन सामने आते हैं।

जब पहली स्थिति में कलाकार समाज के साथ तादात्मय स्थापित न कर पाने के कारण सम्मान, प्रोत्साहन और प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाता है, तब समाज की भावनाओं के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए उसे दूसरी विधि को अपनाना होता है पहली स्थिति में ललित कलाओं को विकसित होने का अवसर मिलता है, जो कला के मौलिक और शुद्ध रूप हैं। दूसरी स्थिति में व्यापारिक कला तथा शिल्प कला को जन्म मिलता है, जो कला के परिवर्तित स्वरूप हैं । कला के ये दोनों ही रूप युग-युगान्तर से विद्यमान रहे हैं। पहले का अस्तित्व कला की मौलिकता और शुद्धता के कारण उसकी शक्ति पर श्राधारित है तथा दूसरे का अस्तित्व समाज की आवश्यकताओं और इच्छाओं के बल पर निर्भर है। समाज कला के मूल और शुद्ध रूप को भी नहीं छोड़ सकता। युग-युग से उसके प्रशंसक और पारखी विद्यमान रहे हैं, और रहेंगे। साथ ही समय, परिस्थिति और समाज की श्रावश्यकताओं के अनुसार व्यापारिक कला और शिल्प भी सामयिक परिवर्तनों के साथ विकसित होते रहते हैं।

कला की प्रकृति सामाजिक है। इस विषय में टाल्सटाय ने इस प्रकार लिखा है-"कोई वास्तविक कला नहीं है, जब तक उसका निर्माणकर्ता अनुभवों के अनुसार बिम्ब विकसित नहीं करता है, जिसके लिए पर्यावरण की बहुत आवश्यकता पड़ती है।" पर्यावरण से तात्पर्य सामाजिके वातावरण से है। इस प्रकार समाज कलाकार को दिशा देता है और वह विभिन्न अनुभवों के आधार पर कला रचना करता है। जबकि कल्पना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है, जो उसकी कला रचना में उसका सहयोग करती है। कल्पना भी पूरी कल्पना ही नहीं होती, उसका आधार भी सामाजिक अनुभवों में ही पाया जाता है। 

इस प्रकार कला की उत्पत्ति और कलाकार के त्रियात्मक पक्ष, दोनों को ही समाज प्रेरणा देता है । कला का विकास सांस्कृतिक विकास के साथ जुड़ा हुआ है। यदि हम सामाजिक विकास के इतिहास का अवलोकन करें, तो पता चलता है कि जैसे- समाज ने विकास किया है, वैसे-वैसे ही संस्कृति भी विकसित हुई है, और क्योंकि संस्कृति का एक अंग कला है, अतः इस कला का विकास क्रम भी उसी के अनुसार दिखलाई पड़ता है। सामाजिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं और उन्हीं के अनुसार कला में भी परिवर्तन होता रहता है। इस प्रकार कला एक सामाजिक उत्पत्ति है।

सामाजिक परिवर्तन कला के रूप-परिवर्तन को प्रभावित करते हैं, जबकि मार्क्सवादी विचारक कहते हैं कि कला सामाजिक परिवर्तन लाती है। अतः स्पष्ट है कि कला और समाज एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और किसका किसके लिए महत्व है, यह बताना कठिन है।

भारतीय समाज परम्परावादी है। यहाँ धर्म इसका मूलतत्व है, जो सामाजिक नियन्त्रण का आधार है। और क्योंकि धर्म और कला के विकास के विषय में यह कहा जाता है कि वे एक साथ विकसित हुए हैं इसीलिए कला सामाजिक नियंत्रण में सहयोगी मानी जानी चाहिए
आज समाज का जो वर्तमान स्वरूप है, वह किसी नियम, नैतिकता और परम्पराम्रों यादि के कारण नहीं है। न ही वह धर्म के कारण हैं, जिसके पास अपनी कोई प्रेरणा नहीं है। वह तो केवल, कला के कारण ही है। कला केवल मनुष्य की पूर्णता को ही व्यक्त नहीं करती, वह उस तत्व को भी व्यक्त करती है जो मानव-मानव के भेद को समाप्त कर उसे एकसूत्र में पिरोता है। कला में कोई भी बन्धन नहीं होता । वह राजनीति, वर्ग, अर्थव्यवस्था आदि किसी का भी अंकुश स्वीकार नहीं करती। श्राधुनिक समय में जिस तेजी से सामाजिक परम्पराम्रों का विघटन हो रहा है, उसका प्रभाव सीधा कलाकार के ऊपर पड़ रहा है, जिसके फलस्वरूप आधुनिक चित्रकला सामाजिक कुण्ठाओं की सच्ची अभिव्यक्ति हैं। जिस प्रकार समाज श्राज व्यक्तिवादी मान्यताओं को प्रस्तुत कर रहा है, उसी प्रकार ग्राज की कला भी परम्पराओंों का त्याग करके व्यक्तिवादिता को ही प्रगट कर रही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि कला प्रारम्भ से आज तक समाज और व्यक्ति की आत्मकथा बनी हुई है। जैसाकि डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने लिखा है "कला व्यक्ति और समाज को सम न्वयात्मक मार्ग प्रस्तुत करती है। वह राष्ट्रीय संस्कृति, विचारों और भावों आदि की अभिव्यक्ति है ।"

इस प्रकार यह मानना पड़ेगा कि कला और समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध है और दोनों ही एक-दूसरे के लिए पूरक का काम करते हुए दिखलायी पड़ते हैं


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