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दिसंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

आज हम हैं, वो कल का जमाना था

आज हम हैं, वो कल का जमाना था सोचा था ना खोएंगे, वो वक्त पुराना था जाना था और चल भी दिए,  जिन्हें दुर तक जाना था आती हैं वो आवाजें क्यों, जब उनको चले ही जाना था बुलाती हैं ये खुशियां हमें क्यों,  जब हमें ही छोड़ के जाना था बीता बचपन और हम बड़े हो गए, क्या इसको यू ही गुजर जाना था याद आता है भईया वो आपका, मक्खी पकड़ कर कानों में छिपाना। वो हवा का झोंका अब सोने नहीं देता, बुझा गया दीपक,अब रोने नहीं देता मंजिल दूर थी कुछ दूर साथ जाना था जाना था और चल भी दिए, जिन्हें दूर तक जाना था जिन्हें दूर तक जाना था......                       By Kk3

UGC net December 2019 visual arts Solve paper

ugc net visual arts 1. कलाकारों का सही क्रम   मेसैचियो 1401, डोनातेलो 1386, बोत्तिसेली1445,    एंड्रिया डेल वेरोचियो 1435 उत्तर  स्वयम  क्रम में लगायें 2.  ऑफसेट प्रिंटिंग में किस प्रकार की छवि  निर्मिमित होती है     1 पूर्णतः सामान       2 प्रतिलोम   3लघु कृत   4 विपर्यस्त उत्तर - अपसेट प्रिंटिंग में इमेज सीधी छपती है इसलिए पहला विकल्प सही है 3. मिलान करें उत्तर - प्रसून जोश-सेंसर बोर्ड ,  शाहिद कपूर- अभिनेता प्रदीप सरकार- विज्ञापन करता,  अविनाश पसरिचा -फोटोग्राफर 4. मिलान करें उत्तर  रीलिस्ट मेनिफेस्टो -गुस्ताव कुर्बे  फ्यूचरिस्ट मेनिफेस्टो- फिलिपो टोमैसो मेरिनोत्ति  क्यूबिस्ट मेनिफेस्टो - अल्बर्ट ग्लेजेस और मेलजिजर दादा मेनिफेस्टओ -हयुगो बाल और ट्रिस्टन तजारा 5. निम्नलिखित में से कौन सा तत्व छापा से संबंधित है  1 मोल्डिंग  2 एक्वाटेंट 3 वीविंग 4 वास उत्तर एक्वाटिंट छापा कला की एक विधा है 6. पुनर्जागरण कालीन चित्रकला निम्...

Experiences In My life

जो गिर के संभलता है, उसके ज्ञान को शिशु ज्ञान कहते हैं। लेकिन जो गिर-गिर के संभले, उसे इंसान कहते हैं//1 जिंदगी एक मौसम की तरह होती है। कभी पतझड़ तो कभी बाहर  लाती है । कभी हम लोगों को रुलाती है, तो कभी हंसाती है  लेकिन जो इस जिंदगी से लड़ जाए,  जिंदगी उसकी सेवक बन जाती है। //2 जो अच्छा सोंचे उसके विचार को सुविचार कहते हैं ।               जो अच्छा व्यवहार करे उसके गुण को सदाचार कहते हैं।//3          जो महकाए इस चमन को ,उसे  गुलबहार कहते हैं ।  और जो सजाए इस संसार को,  उसे श्रृंगारकार कहते हैं//4 जो पिता थे बुद्ध के उन्हें शुद्धोधन कहते हैं । जो मन को मोह ले उसे मनमोहन कहते हैं । जो थे सम्राट संगीत के उन्हें तानसेन कहते हैं।  और जो इनके बारे में पढ़ ले उसे विद्वान कहते हैं।//5

शब्द और चित्र संवाद के माध्यम

     शब्द और चित्र दोनों अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम है दोनों के द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं दोनों ही प्राचीन काल से संप्रेषण के प्रमुख स्वरूप रहे हैं पर शब्द और चित्र दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं और संभावनाएं हैं दोनों का कार्य एक जैसा है पर दोनों एक जैसे दिखते हुए भी बहुत अलग अलग नजर आते हैं      शब्दों के मेल को या धाराप्रवाह को भाषा का नाम देते हैं  प्रत्येक भाषा शब्दों  के योग का ही परिणाम होती है यहीं पर शाब्दिक संचार का स्वरूप या संप्रेषण की सीमाएं दम तोड़ने लगती हैं भाषा किसी क्षेत्र तक ही स्वीकार होती है बल्कि उससे जाने जानने वालों तक ही को जोड़ती है उदाहरण के लिए हिंदी भाषा के जानने वाले लोग अगर अन्य भाषा को नहीं जानते तो दूसरी भाषा का साहित्यक संवाद अथवा व्याख्यान जितना भी सशक्त हो वह उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगा अर्थात उनकी समझ के बाहर की बात होगी भाषा की भिन्नता भले ही संचार में बाधक बनती है पर भाषाओं का सहयोग भी एक दूसरे के लिए वरदान सिद्ध होता है उन्हें नए शब्दों का उपहार प्रदान करती हैं    ...

तुम मिले तो हम बस सोचते ही रहे

तुम मिले तो हम बस सोचते ही रहे लफ्ज़ कुछ कह ना सके हम देखते ही रहे शायद प्रेम की है यही परिभाषा नजरों ही नजरों में बात करते रहे....1 प्यार तो ही था अधूरे मिलन में सनम तुम मिले तो ये पूरा हुआ हुआ खुद में ही देखते हैं तुमको सनम तुम मिले तो जिंदगी का सफर पूरा हुआ....2 देखते ही चले हम तेरे रास्ते जिंदगी का सफर कट जाए तेरे वास्ते  अब न टूटेंगे प्यार के रास्ते मिलकर चलेंगे इस सफर में मंजिल के वास्ते....3 दिलों का मेल है कितना अनूठा सनम देखते ही रहे हम कह गई दूरियां सब खोजने से जो न मिला अब तक मुझे  तेरे आने की आहट ने सब दे दिया ओ सनम....4 मिलते मिलते हमें एहसास हो गया  हम हैं तेरे लिए तुम हो मेरे लिए देखते ही देखते यूं लगा प्यार हो गया हम हैं एक दूजे के लिए.....5 तुम मिले तो हम बस सोचते ही रहे लफ्ज़ कुछ कह ना सके हम देखते ही रहे.....

वर्तमान कला की दशा एवं दिशा (ललित कला विभाग कानपुर विश्वविद्यालय के कैम्प के संदर्भ में )

               आयोजन शब्द कितना सार्थक सन्दर्भ प्रस्तुत करता है जो अपने साथ नई अभिलाषा आशा और उमंग लेकर आता है उमंग ही मानव जीवन को गतिशील और विकास के पथ पर आगे बढ़ाती है तथा आने वाले समय में उसके सम्मुख आने वाली चुनौतियों को सरल करने में प्रेरणा का भी कार्य करती है पर हमें इसके दूसरे पक्ष को भी ध्यान रखना आवश्यक है जो केवल आवश्यक ही नहीं अपितु विकास के लिए महत्वपूर्ण भी है किसी समारोह की सफलता उसके उद्देश्यों में निहित होती है आयोजन के समाप्त होने के बाद एक शैल्य चिकित्सक की भांति उसमें से अच्छे बिंदुओं को गिनना बहुत आवश्यक है पर जो चीजें स्वयं निर्धारित प्रारूप के अनुसार नहीं हो पाई या कुछ कमी रह गई है उन कारणों पर गौर करके भविष्य में सुधार करने का प्रयत्न करें जिससे आप रोग मुक्त हो पाएंगे                इस पृष्ठभूमि भूमि के पश्चात मैं विषय की ओर लौटता हूं कानपुर विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग और राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश की ओर से एक कलाकार कैंप और सेमिनार का आयोजन 14 से 20 नवम्बर के मध्य कि...

संस्थापन कला instalation art

    संस्थापन कला संस्थापन कला अभिव्यक्ति की एक नई विधा है जो कलाकार को अपने कार्य को करने की और अधिक स्वतंत्रता प्रदान करती है इसमें कलाकृति और दर्शक दोनों का पृथक अस्तित्व ना होकर एक पूर्ण कृति का दोनों को मिलाकर निर्माण होता है इसके विपरीत चित्र और मूर्तियों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व होता है जबकि संस्थापन कला  दर्शक के आने पर अपनी सक्रिय अवस्था में आती है यहां पर यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या संस्थापन कला स्वयं कभी सक्रिय नहीं होती बल्कि निष्क्रिय अवस्था में रहती है लेकिन ऐसा सोचना भी गलत होगा संस्थापन कला और मूर्तिकला तथा चित्रकला में एक आधारभूत अंतर है अंतिम दोनों को दर्शक आलोकित कर सकता है पर उसका वह स्वयं हिस्सा नहीं बन पाता है इससे मेरा आशय कृति का स्वयं को अंग मान लेना है कला दीर्घा में जाकर चित्र मूर्तियों को देखने का आनंद तथा कृतियों में निहित संदर्भों और सौंदर्य का रसपान किया जा सकता है पर  चित्र या मूर्ति में दर्शक को कोई स्थान नहीं मिलता क्योंकि यह दोनों माध्यम दर्शकों के लिए स्थान नहीं छोड़ते इसीलिए मैं कह रहा हूं यह दोनों माध्यम स्वयं में पूर्ण य...