सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जगमोहन चोपड़ा का जीवन परिचय एवं कला यात्रा | Jagmohan Chopra Biography in Hindi)

जगमोहन चोपड़ा: जीवन परिचय, कोलोग्राफी तकनीक एवं ग्रुप-8 (TGT, PGT, NET कला नोट्स)

आधुनिक भारतीय छापाचित्रकार: प्रो. जगमोहन चोपड़ा (Jagmohan Chopra)

भारतीय समकालीन कला इतिहास में प्रो. जगमोहन चोपड़ा का नाम आधुनिक छापाकला (Printmaking) को एक स्वतंत्र और प्रतिष्ठित विधा के रूप में स्थापित करने वाले अग्रदूतों में सबसे प्रमुख है। टीजीटी (TGT), पीजीटी (PGT), और यूजीसी नेट (UGC NET Visual Art) जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से उनका जीवन, उनकी कोलोग्राफी तकनीक और 'ग्रुप 8' की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन विषय हैं।


1. जीवन परिचय (संक्षिप्त अवलोकन)

जन्म 1935, लाहौर (अविभाजित भारत, वर्तमान पाकिस्तान)
मृत्यु 3 मार्च 2013, नई दिल्ली
मूल विधा छापाकार (प्रिंटमेकर), चित्रकार और फोटोग्राफर
विशेष पहचान भारत में कोलोग्राफी (Collography) विधा के प्रवर्तक एवं ग्रुप-8 के संस्थापक
प्रमुख सम्मान कला रत्न (AIFACS द्वारा, 1988), राष्ट्रीय ललित कला अकादमी पुरस्कार

2. प्रारंभिक जीवन एवं कला शिक्षा

  • प्रारंभिक पृष्ठभूमि: जगमोहन चोपड़ा का जन्म 1935 में लाहौर में हुआ था। देश के विभाजन के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया।
  • कला अध्ययन: उन्होंने दिल्ली पॉलिटेक्निक (School of Art / Art Department, Delhi Polytechnic) से 1958 में 'नेशनल डिप्लोमा इन फाइन आर्ट्स' की उपाधि प्राप्त की।
  • तकनीकी व बौद्धिक विकास: उनका झुकाव विज्ञान, फोटोग्राफी और साहित्य तीनों में था। विज्ञान की उनकी समझ ने छापाकला की जटिल रासायनिक व तकनीकी बारीकियों को सुलझाने में उनकी बहुत मदद की।

3. अध्यापन एवं प्रशासनिक योगदान

  • कॉलेज ऑफ आर्ट, नई दिल्ली: अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कॉलेज ऑफ आर्ट, नई दिल्ली में कला प्रवक्ता (Lecturer / Senior Lecturer) के रूप में अध्यापन शुरू किया।
  • गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़: वर्ष 1976 में वे गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़ के प्रिंसिपल (प्राचार्य) नियुक्त हुए। वर्ष 1992 में वे इसी पद से सेवानिवृत्त हुए। उनके कार्यकाल में चंडीगढ़ का यह कला संस्थान देश भर में प्रिंटमेकिंग का एक प्रमुख केंद्र बना।
  • आईफैक्स (AIFACS): वे 'ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स सोसाइटी' (AIFACS) के मानद सदस्य, चेयरमैन तथा बाद में 1991 से 1997 तक अध्यक्ष (President) भी रहे।

4. तकनीकी नवाचार एवं शैली

  • कोलोग्राफी (Collography / Cardboard Intaglio) के जनक: भारत में जब जिंक या कॉपर प्लेट्स (धातु की प्लेटें) बहुत महंगी और दुर्लभ थीं, तब जगमोहन चोपड़ा ने गत्ते (Cardboard / Hardboard) पर विभिन्न टेक्सचर और सतहें तैयार करके इन्टैग्लियो (Intaglio) विधि से प्रिंट लेने का सफल प्रयोग किया। इस कम खर्चीली तकनीक (कोलोग्राफी) ने भारतीय प्रिंटमेकर्स को खुलकर नए प्रयोग करने की स्वतंत्रता दी।
  • शैलीगत विशेषताएं: उनकी कृतियों में अमूर्तता (Abstraction), ज्यामितीय संरचनाएं और गहरे टेक्सचर (Textures) का संतुलित संयोजन देखने को मिलता है। वे केवल रूपाकारों (Forms) तक सीमित नहीं रहे, बल्कि रंगों की पारदर्शिता, ओवरलैपिंग और परतों के माध्यम से एक आंतरिक, काव्यात्मक संसार रचते थे।

5. 'ग्रुप 8' (Group 8) की स्थापना

  • स्थापना वर्ष: 1968 (नई दिल्ली)।
  • संस्थापक एवं सचिव: जगमोहन चोपड़ा।
  • उद्देश्य: भारत में केवल छापाकला (Graphic Arts / Printmaking) को समर्पित कलाकारों को एक मंच देना और ग्राफिक आर्ट को मुख्यधारा की कला के समकक्ष खड़ा करना।
  • सहयोगी सदस्य: इस आंदोलन से अनुपम सूद, जयंत पारिख, उमेश वर्मा, विजय शर्मा जैसे महत्वपूर्ण प्रिंटमेकर्स जुड़े रहे।

6. प्रमुख कलाकृतियां एवं श्रृंखलाएं

  • कंपोजिशन सीरीज़ (Composition Series): उनकी अधिकांश महत्वपूर्ण छापाकृतियों को Composition, Composition BP, Composition-II जैसे शीर्षकों से जाना जाता है।
  • कंडेम्न्ड (Condemned)
  • इमेज (Image - I, II, III)
  • येलो एब्स्ट्रैक्शन (Yellow Abstraction)
  • कलेक्शन: इनके प्रिंट और चित्र राष्ट्रीय आधुनिक कला दीर्घा (NGMA, नई दिल्ली), राष्ट्रपति भवन, ललित कला अकादमी तथा कई अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों में संगृहीत हैं।

7. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Points)

  1. ग्रुप 8 के संस्थापक कौन थे? — जगमोहन चोपड़ा (1968)।
  2. भारत में कार्डबोर्ड इन्टैग्लियो / कोलोग्राफी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय किसे जाता है? — जगमोहन चोपड़ा को।
  3. जगमोहन चोपड़ा मुख्यतः किस विधा के लिए विख्यात हैं? — प्रिंटमेकिंग (ग्राफिक आर्ट)।
  4. वे किस प्रतिष्ठित संस्थान के प्राचार्य रहे? — गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट, चंडीगढ़ (1976–1992)।
  5. AIFACS द्वारा उन्हें कौन सा सर्वोच्च सम्मान दिया गया था? — 1988 में 'कला रत्न'।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दीपावली

  दीपावली Child Art (Diwali)                                                दीपावली त्यौहार उत्साह उमंग अभिलाषा सुख शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है ऐसी हमारी मान्यता है इस दिन घरों की सफाई करने के साथ ही दीपों से सजाया जाता है यह सारा दृश्य मन को प्रफुल्लित अवश्य करता है दीपावली मनाने के पीछे धर्म और विज्ञान के अपने-अपने तर्क हैं पर मैं यहां पर इनका उल्लेख करना नहीं चाहता यह तो हर व्यक्ति को पता है यहां पर सवाल दीपावली पर्व के महत्व का है हम इसे क्यों मनाते हैं यह हमारे लिए किस प्रकार उत्थान या आशा का उत्सव हो सकता है दीपावली का पर्व हर साल आता है और आएगा भी पर केवल किसी उत्सव को मना लेने से वह पूर्ण फल देगा ऐसी अभिलाषा करना स्वयं को ठगने जैसा है बल्कि मूल सवालों के उत्तर खोज कर उनको अपने जीवन में पूर्ण नहीं तो आंशिक रूप से जगह जरूर दें जिससे प्रकाश का त्यौहार सच्चे मायने में आशा अभिलाषा का उत्सव बन सके Diwali        ...

प्रागैतिहासिक काल की कला

       प्रागैतिहासिक काल के चित्र ग्राम जीवन, भीमबेटका   नोट  पूर्व इतिहास शब्द का पहला प्रयोग डैनियल विल्सन ने 1851 ई0 में किया था जान लुबाक ने अपनी अपनी पुस्तक प्रागैतिहासिक टाइम्स में  सर्वप्रथम पाषाण काल ​​को विभाजित किया भारत में 1963 ईस्वी में पुरापाषाण कालीन औज़ारों की खोज हुई रॉबर्ट ब्रूस फ़ुट पहले व्यक्ति थी       कला की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, निश्चित रूप से इस विषय में हमारे पास कोई साक्ष्य नहीं है, फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मानव जीवन के साथ ही कलाओं का जन्म हुआ होगा। प्रागैतिहासिक मानव की सभी खोज अचानक से हुई, उदाहरण के लिए आग जलाने की खोज, दो पत्थरों को रगड़ते  हुए हुई। ऐसी ही कला का ज्ञान हुआ। जहां पर हम रहते हैं उन स्थानों पर पैरों एवं क्रिया कलापों के चिन्ह छोड़ते हैं तथा छाया से भी आकृतियां बनती हुई दिखाई पड़ती है,  छाया को देखकर हम उत्सुक हो जाते हैं।   प्रागैतिहासिक काल की कला को तीन भागों में बाँट दिया गया है। 1 पूर्ण पाषाण काल 2 मध्य पाषाण काल 3 उत्तर पाषाण काल   पूर्ण पाषाण काल ...

पाल चित्र शैली

             पाल शैली Pal Shaili         Pal Shaili  आठवीं सती में प्रारंभ हुई बौद्ध धर्म के अनुसार गोपाल नाम के एक सेनानायक ने 730 ईसवी में एक राजवंश की स्थापना की जो पाल राजवंश के नाम से जाना गया इसके पश्चात इस राजवंश में क्रमशः धर्मपाल देवपाल नारायणपाल महिपाल जैसे महत्वपूर्ण शासक हुए और पाल काल में  कला की भारी उन्नत हुई रामपाल पाल राजवंश का अंतिम शासक था इसको सामंत सेन ने परजित कर इस राज्य पर अधिकार कर लिया         पाल शैली के चित्रों में अजंता शैली की विशेषताएं मिलती हैं या यूं कहें यह जनता शैली की एक विकृति शैली का ही रूप है यहां पर चित्र 22.25 × 2.25 इंच के ताड़पत्र पर बने हैं पोथी में चित्र आयताकार या वर्गाकार अंतराल में अंकित किए गए थे चित्रों का विषय महायान और ब्रजायन बौद्ध ग्रंथों की विषयवस्तु रही है पाल शैली के अधिकांश पोथियां बंगाल बिहार नेपाल आदि केंद्रों पर चित्र की गई ताल पत्रों के मध्य में बने चित्रों का विषय महायान के देवी-देवताओं से संबंधित रहा है जबकि समन्वय पत्रों के दोनो...