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sailoz mukherjee

कलाकार शैलोज मुखर्जी का जीवन परिचय

शैलोज मुखर्जी का व्यक्तित्व बहुत ही समृद्ध था उनकी आत्मा एक तीर्थ की तरह थी हाथ एक कलाकार के जैसे था और हृदय कवि का 
जया अप्पास्वामी

शैलोज मुखर्जी का जन्म एवं शिक्षा

शैलोज मुखर्जी का जन्म 1907 ईस्वी में कोलकाता पश्चिम बंगाल में हुआ था बचपन इनका वर्तमान पश्चिम बंगाल में बीता वहीं पर पढ़े और कोलकाता स्कूल आफ आर्ट से डिप्लोमा प्राप्त किया कुछ समय तक टोबैको इंपिरियल कंपनी में कला निदेशक के पद पर भी कार्य किया

शैलोज मुखर्जी की कला यात्रा

शैलोज मुखर्जी की पर लोक कला की परंपरा का प्रभाव भी दिखाई देता है इनकी गणना उन कलाकारों में की जाती है जिन्होंने अपनी आधुनिक कला को प्रभावपूर्ण बनाने के लिए लोक कलाओं का सहारा लिया इनकी कला में परंपरा और भारतीयता सदैव बनी रहे इनके प्रमुख विषय पारंपरिक शास्त्री या साहित्य ना होकर दैनिक जीवन से जुड़े होते थे प्रतिपल स्पंदन करते नर नारी बदलता हुआ प्राकृतिक रूप तथा पशु पक्षी भी आकर्षक लगते हैं

शैलोज मुखर्जी चित्रों का निर्माण प्रबल इच्छा होने पर ही करते थे मुखर्जी का जन्म उस समय हुआ जब भारतीय कला का अपने संक्रमण काल से गुजर रही थी अवनींद्र नाथ ठाकुर द्वारा विकसित की गई वास परंपरा का देश में वर्चस्व था वहीं दूसरी तरफ अमृता शेरगिल की पश्चिमी प्रभाव से युक्त शैली में भारतीय विषयों का चित्रण था विषाद दुख दीन हीनो का चित्रण किया गया था

यूरोप, मिश्र, तिब्बत, सिक्किम तथा अन्य कई देशों की यात्राओं ने शैलोज मुखर्जी के सृजन में चार चांद लगा दिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सेलों द माइ, पेरिस संस्था सदस्य भी रहे 1944 ईस्वी में Sharda vakil school off art में अध्यापन भी किया तत्पश्चात दिल्ली के पॉलिटेक्निक कला विभाग में अध्यापन रत रहे शैलोज के चित्रों में सादगी, भव्यता, सपाट धरातल, आकृतियों का लंबापन, रेखा एवं रंग रंग की सशक्त व्यंजना, रंगों का संतुलित उपयोग, आकृतियों का कुशल संयोजन, शक्ति पूर्ण संरचना आदि उनकी शैली की महत्वपूर्ण विशेषताएं रही है 



शैलोज मुखर्जी अपनी मूल प्रेरणा मातिस को मानते थे जो भी नए रूप चाहे वह प्राचीन हो या परंपरा के अनुकूल हो जो उन्हें अच्छे लगते थे उन्हें वह स्वीकार कर लेते थे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इनके रूपों में सरलीकरण और रंग की जीवंतता पेरिस यात्रा के समय एकोल द से प्राप्त हुई विशेष रूप से मातिस और मोंद्रियानी लेकिन इनकी कला पर मुख्य रूप से भारतीय लोक कला और बसोहली लघु चित्र शैली का प्रभाव दिखाई पड़ता है यूरोप यात्रा के समय इनके कला में निर्णायक परिवर्तन देखने को मिले फिर भी मुखर्जी साहब के कार्यों की जड़ें भारत में ही है और वह अत्यधिक गहरी हैं 

शैलोज मुखर्जी के चित्र

कुआं, 
पतझड़ की तूफानी हवा, 
सफल स्वपन, 
चुंबन,
नृत्य, 
बौर, 
वन में श्रृंगार 

नोट 
इसलिए को तैयार करते हुए पूर्ण सावधानी रखी गई है फिर भी किसी प्रकार की त्रुटियां सुझाव के लिए kalalekhan@gmail.com ईमेल करें

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