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Chitrakala me pravah ka mahatva



कलाकार के लिए प्रवाह की आवश्यकता क्यों है

      एक कलाकार के लिए प्रवाह का उचित का ज्ञान होना अत्यधिक आवश्यक है बिना इसके कलाकृति में सौंदर्य के भाव को जगाया नहीं जा सकता है रिदम या प्रवाह उसी प्रकार से एक कलाकार के लिए महत्वपूर्ण है जिस प्रकार से शरीर में आत्मा का यह कलाकृति में प्राणों का संचार करती है और उसे सौंदर्य युक्त बनाती है संसार के लगभग सभी ललित कलाओं में प्रवाह या लय विद्यमान हैं अजंता, एलोरा, बाघ, एलिफेंटा, खजुराहो आदि स्थलों की चित्र एवं मूर्तियों में यह तत्व मुख्य रूप से विद्यमान है यहां तक इनकी प्रसिद्धि के पीछे यह यही तत्व मुख्य भूमिका निभाता है

 rhythm प्रवाह की परिभाषा 

   प्रवाह का अर्थ चित्र भूमि पर दृष्टि का स्वतंत्र अबाध एवम् मधुर विचरण होता है प्रवाह व्युक्त चित्र में नेत्र को उलझाना अथवा कष्टदायक विरोधाभास का सामना नहीं करना पड़ता है यह प्रवाह रेखा, रूप, वर्ण तथा तान सभी से मिलकर उत्पन्न होता है 

   अंतराल में कोई गति नहीं होती परंतु जैसे ही इसमें कोई बिंदु प्रगट होता है तनाव उत्पन्न हो जाता है क्योंकि दृष्टि बिंदु पर जम जाती है बिंदुओं की संख्या बढ़ने से दृष्टि एक बिन्दु से दूसरे बिंदु पर क्रमशः विचरण करती है और गति का जन्म होता है यह गति संगठित और सरल प्रवाहयुक्त हो सकती है तथा अशांत, अरुचिकर अंतः प्रवाह हीन बिंदुओं के आकार और स्थान द्वारा इस गति का मार्ग निर्देशित होता है

गति प्रवाह के प्रकार 

चित्र में गति साधारण का तीन प्रकार की हो सकती है 
  • सरल गति  जैसे सरल रेखा के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक की गति 
  • कोणीय गति कोणदार या टूटी रेखा के स्वरुप 
  • लहरदार गति सर्पाकार अथवा वक्राकार अनुरूप
         प्रकृति में किसी भी प्रकार की कोई रेखा नहीं पाई जाती है ना ही उसका विभाजन वर्ग आयत त्रिभुज में किया जा  सकता है प्रकृति मैं लहरदार गति पाई जाती है इसीलिए वह भौतिक और मानसिक सुख प्रदान देती है मानव शरीर की लहरदार गति सौंदर्य की अनुभूति कराती है मां की गोद में बच्चे की शारीरिक गति वात्सल्य का बोध कराती है नंदलाल बसु ने इसे जीवन प्रवाह का है जिसमें रस निरूपण की महान क्षमता होती है परंतु हमें घोड़ी रेखाएं और तीव्र गति की अनुभूति कराती है जब लयात्मक रेखाएं एक दूसरे को जोड़ती है तो सौंदर्य की अनुभूति कराती है

प्रवाह सृजन विधि

साधारण सा चित्र में प्रभाव उत्पन्न करने के तीन ढंग हो सकते हैं 
  • आकृति की आवृत्ति 
  • आकृति के अनुक्रम द्वारा 
  • सहज संबंध अथवा अनवरत रेखा गति

 प्रवाह की अनुभूति

प्रवाह शब्द ही गति के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है जिसके उच्चारण मात्र से हमारे मस्तिष्क में गति का आभास होने लगता है जब रेखा सीधी पड़ी हुई या खड़ी हुई होती है तब भी उसमें गति होती है कोणीय रेखाओं में भी गति निर्देशन करने की क्षमता होती है परंतु जब रेखा उपर नीचे उठती है तो लय प्रतिबिंबित करने लगती है आवृत्ति सिद्धांत के अनुसार इसे क्रमबद्ध करने से गति मिलती है इसी उठने और गिरने की आवृत्ति को में कोनीयता समाप्त कर दिया जाए तो लयात्मक गति प्रवाह का सृजन होता है

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