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proportion in Indian painting


 भारतीय चित्रकला में प्रमाण 

  प्रमाण का महत्व

        एक सफल कलाकार के लिए प्रमाण का ज्ञान होना अत्यधिक आवश्यक है बिना इसके सार्थक चित्र का निर्माण करना संभव प्रतीत नहीं होता इसके द्वारा कलाकार चित्रभूमि को इस प्रकार से विभाजित करता है कि वह देखने में रुचिकर प्रतीत हो तथा नीरसता को दूर किया जा सके

परिभाषा

       प्रमाण को संबद्धता का सिद्धांत भी कहा जाता है आकृतियों का अपना प्रमाण तथा सभी आकृतियों का एक दूसरे से संबंध और सभी आकृतियों तान तथा वर्ण इत्यादि का चित्र भूमि से संबंध निश्चित करता है

     प्रमाण का कोई निश्चित सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता फिर भी ऐसी सीमाएं जानी जा सकती हैं जिनका अतिक्रमण करने पर अरुचिकर प्रमाण की उत्पत्ति होती है अतः प्रमाण का सर्वप्रथम दायित्व चित्र में रुचि उत्पन्न करना है कुछ लोगों में स्वतः ही अच्छे प्रमाण के प्रति रुचि होती है परंतु कुछ लोगों को अच्छे प्रमाण का ज्ञान प्राप्त करना होता है इसीलिए प्रारंभ में एक आधार की आवश्यकता होती है शेष अनुभव से प्राप्त हो जाता है

यूक्लिड गोल्डन  सिद्धांतPrinciple of section

      इस सिद्धांत का प्रतिपादन यूनानी विद्वान यूक्लिड ने किया था इसे सोनी विभाजन सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है इसमें चित्र दल को इस प्रकार विभाजित किया जाता है जिससे रुचिकर प्रभाव उत्पन्न किया जा सके उदाहरण के लिए


प्रमाण और भूमि विभाजन

       कलाकार चित्र भूमि पर जैसे ही अंकन प्रारंभ करता है वैसे ही तल विभक्त होने लगता है जब कलाकार एक आकृति को अंतिम रूप दे रहा होता है तो उसके सामने संतुलन की समस्या उत्पन्न होती है इसके लिए उसे प्रमाण और तल विभाजन के विषय में उपयुक्त जानकारी काम आती है वैसे तो समय-समय पर कई विद्वानों ने चित्रतल को विभाजित करने के कई सिद्धांत दिए हैं परंतु  यह कलाकार के अनुभव पर आधारित प्रक्रिया है जैसे-जैसे कलाकार अनुभवी होता जाता है वैसे वैसे प्रमाण ने निर्धारण की विधा में प्रवीण होता जाता है

वर्ण और प्रमाण

        कलाकार रंगत में परिवर्तन कर भी प्रमाण को सार्थक बना सकता है इसके लिए वह अकसर विरोधी रंगों का प्रयोग करता आया है इस विधा के द्वारा वह चित्र में आने वाले निरर्थक भाव को दूर कर सकता है प्रत्येक रंग का अंपना स्वाभाव और बल होते हैं जो चित्र तल पर लग कर दर्शक पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं कलाकार को रंगो के प्रभाव को भी जानना आवश्यक है यह धीरे-धीरे कार्य करते रहने से अनुभव से उसे प्राप्त हो जाता है और अधिकांश कलाकार अपनी एक अलग रंग संगती को प्राप्त कर लेते हैं

मानव आकृति और प्रमाण

            कलाकृति के निर्माण के लिए कलाकार को हमेशा मॉडल का प्रयोग करना चाहिए परंतु कलाकार को हमेशा आदर्श मॉडल नहीं मिलता है उदाहरण के लिए अगर उसे किसी देवता या काल्पनिक मनुष्य की चित्र या प्रतिमा बनाना है तो वह क्या करें इस स्थिति में वह लोक व्यवहार में पाए जाने वाले प्रमाणों के अनुसार आकृति के हाथ, पैर, गर्दन व अन्य शारीरिक बनावट में अंतर कर सकता है जैन, लघु चित्र तथा किशनगढ़ शैली व रविशंकर रावल, जॉर्ज कीट की मानव आकृतियों का यह तुलनात्मक अध्ययन करें तो प्रमाण की भिन्नता का महत्त्व स्पष्ट हो जाएगा

भारतीय शिल्प शास्त्र में प्रमाण को ताल, प्रमाण, कार्य प्रमाण  के नाम से जानती है तथा प्रमाण विहीन  प्रतिमा का पूर्ण रूप से निषेध करती है 

प्रसिद्ध विद्वान एवं कलाकार माइकल एंजेलो ने मानव प्रतिमा को 8 भागों में विभाजित किया है नारी आकृति को सिर से साढ़े सात गुना बताया है पुरुषों का सबसे चौड़ा भाग उसके कंधे जो सिर के नाम के दोगुने से किंचित कम होते हैं नारी के नितम्ब सिर के दोगुना चौड़ा होता है 

ग्रीक मूर्ति का निरीक्षण करने के बाद सैमसन की पुस्तक एलिमेंट्स ऑफक्रिटिसिज् में भी कुछ ऐसे ही लक्षण बताए गए हैं 

रोमन वास्तुशास्त्री vitruvious के अनुसार मुख, समस्त शरीर की मां का दसवां भाग होता है 

भारतीय शिल्प शास्त्रों ने मानव शरीर को उनके चारित्रिक गुणों के अनुसार 10 ताल, 9 ताल, 8 ताल, 7 ताल, पांच ताल के रूप में वर्णित किया है 

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