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N S Bendre

 एन.एस. बेंद्रे 1910-1992

चित्रकार एन एस बेंद्रे कला यात्रा और जीवन परिचय

            इंदौर में जन्मे एनएस बेंद्रे ने मुंबई कला विद्यालय कलाकार को इंदौर और इंदौर में देवलालीकर से कला की शिक्षा प्राप्त की बेंद्रे साहब देश के प्रसिद्ध कलाकार होने के साथ-साथ देश के प्रतिष्ठित बड़ौदा विश्वविद्यालय में चित्रकला के प्रोफेसर भी रहे हैं साकी शैली में। ब्रिटिश अकादमी परंपराओं भारतीय लघु चित्र बंगाल शैली की स्वच्छंदता और सेज़न व गोगान जैसे उत्तर प्रभाववादी आदि कलाकार का प्रभाव दिखाई पड़ता है

             एनएस बेंद्रे का पूरा नाम नारायण श्रीधर बेंद्रे है जीवन चरम गरीबी व एकताकीपन और दुख से बिता लेकिन कला आराधना कभी भी नहीं छोड़ी जो उनके जीवन का ध्येय बन गया था।ज्योति भट्ट, शांति दवे, जी आर संतोष, गुलाम मोहम्मद शेख, रतन परिमू , त्रिलोक कॉल आदि बेंद्रे साहब के प्रमुख शिष्य थे

             बेंद्रे साहब की संपूर्ण कला यात्रा को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं पूर्व काल के चित्रों में वाश व ग्वांस तकनीक में बनाए गए दृश्य चित्रों जो बनारस हरिद्वार कश्मीर इंदौर आदि के हैं जो सौंदर्य से परिपूर्ण हैं और फ्रांसीसी प्रभाववाद और जर्मनी के अभिव्यंजनावाद से स्पष्ट हैं। रूप से प्रभावित हैं दुसरा चरण 1945 में शांतिनिकेतन यात्रा के उपरांत प्रारंभ होता है जो तापमान विधि से निर्मित रेखा कोणों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है इस समय के स्टील लाइफ मानव आकृतियां विशेष रूप से प्रसिद्ध है और स्वयं एक रंगसाज के रूप में स्थापित है। यह अवधि धनवादी और से प्रेरित थी  1960 ई के पश्चात एनएस बेंद्रे की शैली में एक नव मोड़ आता है जोअमूर्त प्रकटंजनावाद से प्रभावित था

  एनएस बेंद्रे का मानना ​​था काला एक मूक संभाषण है और वह कला निर्माण के पीछे निहित अपने उद्देश्य को बताते हुए कहते हैं कि मेरे चित्र बनाने के दो उद्देश्य थे। दूसरों के साथ संभाषण कर सकूं और दूसरी कला के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करूं।

उन्होंने कहा कि "मैं धरती का निवासी हूं मैं इस धरती पर चलता हूं फिरता हूं मैं इस धरती के अलावा अन्य किसी चीज के विषय में नहीं सोचता यहां पर उपलब्ध वस्तुएं मेरे लिए पुस्तकालय की तरह हैं इसके अलावा और किसी भी चीज में चयन नहीं है। यही कारण है, मैं स्वप्न चित्र नहीं बनाता, मैं इस दुनिया में जो कुछ अनुभव करता हूं उसी को अपने चित्रों में उतारता हूं बाकी चीजें मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती हैं "

    1960 मैं बेंद्रे ने वर्तमान कला परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा आम जनता अज्ञानी और अनभिज्ञ है धनी लोग अपनी इच्छा पूर्ति के अहंकार में डूबे हैं विद्यार्थी उस ज्ञान तक सीमित हैं जो उन्हें अभी तक सिखाया गया है उनकी स्थिति ऐसी ही है जैसे कि पिजड़े में। एक तोता कला अध्यापक गण अपनी उपलब्धियों को लेकर फूले नहीं समा रहे है और नित्य प्रतिदिन होने वाले परिवर्तनों को भी पूर्वाग्रह से देखते हैं फिर भी यह बात दिलचस्प है कि लोगों की कला में विचारों को बढ़ रही है अभी सत्य है या विचार अज्ञानता अंधविश्वासों और अंधभक्ति को देखते हुए विचारों से ग्रसित है निश्चित रूप से यह जानकारियों से संबंधित और शिक्षित होने की जरूरत है

एन एस बेंद्रे के चित्र

   सूरजमुखी के फूल, जेष्ट की दोपहर, रेज का ग्रामीण दृश्य, बनाना, गाय और बछड़ा, गाली का आकर्षण, घुमक्कड़, भारत छोड़ो, गासिप

कांटे कृति के लिए राष्ट्रीय उपाधि मिली

एन एस बेंद्रे के सम्मान में

      पदम श्री गगनेंद्र अवनींद्र पुरस्कार और 1969 में राष्ट्रीय ललित कला अकादमी की फेलोशिप कालिदास सम्मान बॉम्बे कलाकार समाज का स्वर्ण पदक

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