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उत्तर प्रदेश विधानसभा की वास्तुकला

प्रदेश विधानसभा की वास्तुकला का परिचय


प्रदेश विधानसभा की वास्तुकला
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विधान भवन की वास्तुकला 

काउन्सिंल हाउस (विधान भवन) के भव्य भवन की नींव 15 दिसम्बर, 1922 को तत्कालीन गवर्नर सर स्पेंसर हरकोर्ट बटलर द्वारा रखी गयी थी तथा 21 फरवरी, 1928 को इसका उद्घाटन हुआ था। इस भवन का निर्माण कलकत्ता की कम्पनी मेसर्स मार्टिन एण्ड कम्पनी द्वारा किया गया था। इसके मुख्य आर्कीटेक्ट सर स्विनोन जैकब तथा श्री हीरा सिंह थे। उस समय इसके निर्माण हेतु 21 लाख रूपया स्वीकार हुआ था। इस भवन की स्थापत्य यूरोपियन और अवधी निर्माण की मिश्रित शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह भवन अर्धचक्राकार रूप में मुख्य रूप से दो मंजिलों में मिर्जापुर (चुनार) के भूरे रंग के बलुआ पत्थरों के ब्लाक से निर्मित है। अर्धचक्र के बीच में 'गोथिक' शैली का गुम्बद है जिसके शीर्ष पर एक आकर्षक छतरी है। इस गुम्बद के चारों ओर सजावट के रूप में ‘रोमन’ शैली में बड़े आकार की पत्थर की मूर्तियां बनी हुयी हैं। भवन के बाहरी भाग के पोर्टिको के ऊपर संगमरमर से प्रदेश का राज्य चिन्ह बना हुआ है।

भवन के अन्दर अनेक हाल एवं दीर्घायें हैं जो मुख्यत: आगरा और जयपुर के संगमरमर से बनी है। ऊपरी मंजिल तक जाने के लिए मुख्य द्वार के दाहिने एवं बायी ओर अत्यन्त सुन्दर शैली में संगमरमर निर्मित गोलाकार सीढ़िया बनी हैं। इन सीढ़ियों की दीवारों पर विशिष्ट प्रकार की पेन्टिंग बाद में करायी गयी है।

गुम्बद के नीचे अष्टकोणीय चेम्बर अर्थात मुख्य हाल बना है। इसकी वास्तुकला अत्यन्त ही आकर्षक पच्चीकारी शैली में है। हाल की गुम्बदीय आकार की छत में जालियां तथा नृत्य करते हुए आठ मोरों की अत्यन्त सुन्दर आकृतियां बनी है। इसी चेम्बर में विधान सभा की बैठकें होती है। माननीय सदस्यों के लिए चेम्बर के दोनों तरफ एक-एक बड़ी लाबी है। 


विधान परिषद् की बैठकों एवं कार्यालय कक्षों के लिए एक अलग चेम्बर का प्रस्ताव जुलाई, 1935 में हुआ। जिसके निर्माण का कार्य मैसर्स फोर्ड एण्ड मैक्डानल्ड को सौंपा गया। मुख्य वास्तुविद ए० एम० मार्टीमंर द्वारा एक्सटेंशन भवन का निर्माण कराया गया जो लोक निर्माण विभाग की देखरेख में नवम्बर, 1937 में पूर्ण हुआ। विधान परिषद् का यह भवन मुख्य भवन के दोनों ओर बनाये गये कमरों व बरामदों से जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश विधान सभा का इतिहास

राज्‍य में विधायी संस्‍थाओं का विकास भारत में विधान मण्‍डल के इतिहास से सीधे जुड़ा हुआ है। वर्ष 1861 तक समस्‍त विधान कार्य ब्रिटेन की संसद के हाथों में था। इस राज्‍य में सर्वप्रथम 5 जनवरी, 1887 को 9 नामनिर्देशित सदस्‍यों के साथ लेजिस्‍लेटिव कौंसिल की स्‍थापना हुई जिसका नाम ‘नार्थ वेस्‍टर्न प्रोविन्‍सेज एण्‍ड अवध लेजिस्‍लेटिव कौंसिल’ था। कौंसिल की पहली बैठक 8 जनवरी, 1887 को इलाहाबाद के थार्नहिल मेमोरियल हाल में हुई थी। गवर्नमेण्‍ट ऑफ इण्डिया ऐक्‍ट 1935 के अनुसार सभी प्रदेशों और तत्‍कालीन राजाओं की रियासतों को मिलाकर भारत में गणतन्‍त्र की स्‍थापना और प्रदेशों को स्‍वायत्‍तता दिये जाने का प्रस्‍ताव था। लेजिस्‍लेटिव कौंसिल मार्च, 1937 तक एकल सदनीय विधान मण्‍डल के रूप में प्रदेश में कार्यरत थी। उपरोक्‍त अधिनियम का राज्‍यों से संबंधित भाग 1 अप्रैल, 1937 को प्रभावी हुआ। इस प्रकार अंग्रेजों के शासन काल में ही देश के 5 और राज्‍यों सहित इस राज्‍य का विधान मण्डल भी एकल सदनीय से द्विसदनीय हो गया। ‘लेजिस्‍टलेटिव असेम्‍बली’ और ‘लेजिस्‍लेटिव कौंसिल’ नाम से दो सदन स्‍थापित हो गये। निचले सदन, लेजिस्‍लेटिव असेम्‍बली का गठन पूर्णत: निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा तथा ऊपरी सदन, लेजिस्‍लेटिव कौंसिल का गठन निर्वाचित और नामनिर्देशित दोनों प्रकार के सदस्‍यों द्वारा किये जाने की व्‍यवस्‍था की गयी। इस बीच राज्‍य का नाम बदल कर ‘युनाइटेड प्रोविंसेज’ कर दिया गया।


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