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Vinod Bihari mukharji

विनोद बिहारी मुखर्जी

अंधापन बहुत जटिल होता है सत्यजीत राय

प्रसिद्ध कलाकार विनोद बिहारी मुखर्जी का जन्म 7 फरवरी 1904 बेहला कोलकाता में हुआ था 1919 ईस्वी में शांतिनिकेतन बीरभूम पश्चिम बंगाल में प्रवेश लिया यहीं पर इन्हें नंदलाल बोस जैसे योग्य कला शिक्षक प्राप्त हुए तथा अध्ययन के पश्चात यहीं पर कला शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए
  • जन्म 1904 बेहला
  • मृत्यु  1980
  • फिल्म  इनर आई
  • पुस्तक  चित्रकर

विनोद बिहारी मुखर्जी अपने गुरु नंदलाल बोस के टच वर्क से विशेष रूप से प्रभावित थे अतः वैसे ही चित्रण करते हुए चित्र को पूर्ण करना चाहते थे शांतिनिकेतन में उनकी रुचि चित्रण के अपेक्षा भित्ति चित्रण में अधिक दिखाई देती है अतः वह भित्ति चित्रकार के रूप में भी विशेष प्रसिद्ध हुए हैं बंगाल शैली की भावुकता तथा साहित्यिक विषयों की अपेक्षा चित्रात्मक तत्वों जैसे हल्के रंगों, गतिपूर्ण रेखांकन तथा टेक्चर आदि को अपने चित्रों में अधिक महत्व दिया है जयाप्पास्वामी ने इन्हीं विशेषताओं को देखते हुए इन्हें भारतीय कला का सेतु बंध कहा है
इनके चित्रों का मुख्य विषय दैनिक जीवन तथा बीरभूम के निवासी रहे हैं उन्होंने अपनी आत्मकथा 
 में लिखी है 1974 में इन्हें पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया
इनके जीवन पर आधारित एक लघु फिल्म एन आर आई का निर्माण किया गया इनकी पत्नी मीरा मुखर्जी भी एक प्रसिद्ध मूर्तिकार रही हैं तथा पुत्री मृणालिनी मुखर्जी चित्रकार तथा मूर्तिकार दोनों विधाओं में पारंगत है

प्रमुख चित्र 

मंदिर का घंटा, मध्यकालीन हिंदू संत, पुल, लाफ्टर, ट्री लवर
विनोद बिहारी मुखर्जी भारतीय चित्रकला के एक ऐसे आधार स्तंभ रहे हैं जिन्होंने अपनी लगातार क्षय होती दृष्टि के कारण भी सृजन को जारी रखा मुश्किल से ही मोटे लेंस की सहायता से चीजों को देख पाते थे पर उस दिन के चित्रों को देखने के बाद इनकी यह अक्षमता कहीं भी दिखाई नहीं देती है कलाकार ने अभिव्यक्ति को और अधिक अर्थवान बनाया भारत में भित्ति चित्रण परंपरा को पुनर्जीवित किया इनके बनाए हुए चित्र शांतिनिकेतन और वनस्थली विद्यापीठ में आज भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं लगातार कार्य करते हुए विनोद बिहारी मुखर्जी की मृत्यु 1980 में हुई

मध्यकालीन हिंदूसंत भित्तिचित्र श्रृंखला

The mediaeval saints विनोद बिहारी मुखर्जी का प्रसिद्ध भित्ति चित्र है जो फ्रस्को बूनो तकनीक में बनाया गया है गीली दीवाल पर रंग घूलकर दीवाल का ही अंग बन जाते हैं जिस कारण रंग अधिक स्थाई हो जाते हैं 
इस भित्ति चित्र में हिंदू मध्यकालीन संतों को चित्रित किया गया है दीवाल के अनुसार ही चित्र भी विशाल आकार का बनाया गया है लंबी-लंबी आकृतियां एक बहती हुई नदी की गति के अनुसार लय तथा ताल का बोध कराती हैं लंबी-लंबी आकृतियां मानवीय कृतियों की विशेषताओं को देखकर गोथिक कला की मूर्ति कला का बोध होता है चित्र की लंबी मानव आकृतियों में उर्ध्वता को दर्शाया गया है छोटी आकृतियां चित्र को संतुलन प्रदान करती हैं लंबी आकृतियां अध्यात्म की महानता को दर्शाती हैं इसी प्रकार छोटी आकृतियां दिन पर दिन की आम लोगों की क्रियाकलापो का प्रतिनिधित्व करती हैं चित्र में प्रभावशाली रेखांकन है तथा रंगों का सीमित प्रयोग किया गया है मुख्य रूप से गेरू, भूरा, पीला तथा मिट्टी के रंगों का प्रयोग किया गया है

विनोद बिहारी से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

विनोद बिहारी मुखर्जी के जीवन पर आधारित सत्यजीत रे ने 1972 में एक लघु फिल्म निर्मित की जो द इनर आई नाम से प्रकाशित की गई
1974 में पद्म विभूषण पुरस्कार
1980 में रविंद्र पुरस्कार
1949-1951 के मध्य नेपाल सरकार के संग्रहालय अधीक्षक और शिक्षा विभाग के सलाहकार भी रहे

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