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UGC NET visual art syllabus

UGC NET visual art syllabus in Hindi

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग


पाठ्यक्रम     Code No. : 79


विषयः दृश्य कलाएँ


दृश्य कलाओं का संबंध ऐसी सर्जनात्मक अभिव्यक्ति से है जिसके प्रमुख निर्धारक तत्व नवप्रवर्तन तथा वैयक्तिकता हैं। उत्कृष्ट कौशल अथवा प्रवीणता से निर्मित ऐसी कलाकृतियों में निवेशित मूल्य निरपवाद रूप से प्रकट होता है जो सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसी कारण इन कलाओं को ललित कलाओं के रूप में भी जाना जाता है। स्टूडियों में कार्य करते हुए दृश्यकलाओं के विभिन्न विशेषज्ञतायुक्त संवर्ग उत्पन्न हुए यथा रेखाचित्रकला, चित्रकला, मूर्तिकला, छपाईकला, डिजाइन इत्यादि जो व्यवहार में माध्यम आधारित संवर्ग हैं। समकालीन समय में दृश्य कला एक एकल अनुशासनिक अभिव्यक्ति से ऊपर उठकर बहु-माध्यम अभिव्यक्तियों की ओर अग्रसर हुई है जो स्थान के रूप में स्टूडियो / दीर्घा / संग्रहालय तथा आर्थिक निर्धारक तत्त्व के रूप में बाजार की परिसीमाओं को पार कर चुकी हैं। इस प्रकार अनुप्रयुक्त कलाओं को यह अपने अंतर्गत समाहित और समाविष्ट करती है. जबकि आधुनिकेतर व्यवहार में फोटोग्राफी तथा डिजिटल माध्यम भी इसके अविभाज्य अंग बन गए हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से कला इतिहास और समालोचना भूत तथा वर्तमान के विकासक्रमों और नवप्रवर्तनों का परीक्षण और विश्लेषण करते हैं और वर्तमान तथा संभावित भविष्य (यों) के विषय में स्टूडियो कार्य के प्रति प्रसंगात्मक जागरूपकता उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार इस पाठ्यक्रम में इस / इन विषय (यों) की सर्वागीण समझ हेतु उपर्युक्त सभी बातों को एकीकृत किया गया है।

पाठ्यक्रम की योजना


इकाई - 1

दृश्य कला के मूलाधार (रेखा, आकृति, रूप, स्थान, रंग, टेक्सचर, रंगाभास, मूल्य, परिप्रेक्ष्य, अभिकल्प इत्यादि)। संघटन के दृश्य सिद्धांतों (अनुपात, एकत्व, समरसता, लय, वैषम्य, संतुलन, अग्रसंकुचन और प्रमुखता इत्यादि) दृश्य कला में दो और तीन आयामों में प्रतिनिधित्व कला के पर्यावरणीय, संकल्पनात्मक और बोधात्मक पक्ष।

इकाई - 2

दृश्य कला के विभिन्न रूप और अन्य प्रकार की सर्जनात्मक अभिव्यक्तियों जैसे प्रदर्शन कला सिनेमा और साहित्य – के साथ उनका परस्पर संबंध।

इकाई - 3

पारंपरिक माध्यमों, सामग्रियों और तकनीकों का ज्ञान और दृश्य अभिव्यक्तियों के समस्त अनुशासनों में उनका अनुप्रयोग, उदाहारणार्थ नक्काशी और हलाई की प्रक्रियाएं; रंग / वर्णक (सांद्र वर्ण, काचन इत्यादि) का उचित प्रयोगः उत्कीर्णन / उद्भुत उत्कीर्ण चित्रकला, छपाई; भित्तिचित्र, भित्तिचित्र के लिए स्थान की तैयारी, लघु चित्रों के लिए वास्ली को तैयार करना, इत्यादि।

इकाई - 4

आधुनिक तकनीकों, प्रक्रियाओं और कार्यविधियों में विकास और समकालीय दृश्य (उदाहरणार्थ, अभ्यासों में उनका अनुप्रयोग उदाहरणार्थ प्रतिष्ठापन, बहुरंगी छपाई; कम्प्युटर साहाय्यित डिजाइन (या रूपांकन)-वेक्टर एवं रेक्टर, कला में मल्टीमीडिया और डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ, ट्रांपि लऔएल इलुजरी हाइपर रियलिज्म इत्यादि में।

इकाई - 5

भारतीय और पाचात्य सौंदर्यशास्त्र तथा कला प्रशंसा का अध्ययन

इकाई - 6

पाश्चात्य कला और कलाकारों के इतिहास को रूपांतरित करने वाले विभिन्न आंदोलनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, प्रागैतिहासिक काल से उत्तर आधुनिक काल की अवधि तक पाश्चात्यकला और कलाकारों का कालानुक्रमिक अध्ययन।

इकाई - 7

प्रागैतिहासिक काल से लेकर 19वीं शताब्दी तक भारतीय कला के घटनाक्रम और कालों का कालानुक्रमिक अध्ययन।

इकाई - 8

कला आन्दोलनों और प्रमुख प्रवर्तकों के संदर्भ में 20वीं तथा 21वीं शताब्दी की अवधि में भारतीय कला में समकालिक प्रथाएं; विज्ञापन, डिजाइनिंग और दृश्य संचार की आधुनिक अवधारणा; समसामयिक दृश्य अभिव्यक्ति में प्रायोगिक रीतियाँ, औपनिवेशिक (ब्रिटिश) कला स्कूलों से लेकर वर्तमान समय तक भारत में कला शिक्षा का विकास।

इकाई - 9

सुदूरपूर्व, दक्षिण पूर्व और केन्द्रीय एशिया और प्राचीन निकट-पूर्व में कला का अध्ययन।
इकाई - 10

भारत में पारंपरिक समुदायों की दृश्य प्रथाओं और उनके समकालिक रूपान्तरणों को समझना - भारतीय 'लोक कला', 'जनजातीय कला और शिल्प कला अभ्यास।


दृश्य कला के विकल्पों के लिए पाठ्यक्रम


विकल्प - I कला का इतिहास


कला ऐतिहासिक प्रविधि के सिद्धान्त – आकारवाद, प्रतिमाशास्त्र, लक्षण विषयक विश्लेषण कला इतिहास में मनोवैयमिक विधिः दृश्य बोध का जेस्टाल्ट सिद्धान्त; दृश्यकला पर वर्ग और जेंडर के सिद्धान्तों का मनोविश्लेषणात्मक प्रभावः विसंरचना और कला इतिहास के लिए उसकी रूपान्तरकारी भूमिका, "नव" कला इतिहास की ओर समकालिक बदलाव; भारत में औपनिवेशिक काल से लेकर स्वातंत्र्योत्तर काल की अवधि तक एक उदीयमान अनुशासन के रूप में कला इतिहास; क्यूरेटर द्वारा प्रबंधन का प्रारंभ संग्रहालय, दीर्घा और कला इतिहास का समागम, सौंदर्यबोध के सिद्धांत और दृश्य कला की कृतियों के ऐतिहासिक / समालोचनात्मक विश्लेषण में उनकी प्रासंगिकता।

भारतीय प्रतिमाविग्यान


भारत में प्रतिमा पूजन की प्राचीनता और प्रतिमा मान विज्ञान के सिद्धान्त प्रतिमा विज्ञान और वैदिक प्रतिमाओं से ब्राह्मण-कालीन प्रतिमाओं तक का विकास, इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वरुण, कुबेर, यम, अष्ट दिकपाल, विष्णु, शिव, शक्ति, सप्तमातृकाएँ, कार्तिकेय, गणेश, और नद्य-देवियां (गंगा और यमुना) इत्यादि का क्रमविकास

बौद्ध प्रतिमा विज्ञान बुद्ध की प्रतिमाओं (जैसे ध्यानी बुद्ध, मानुषी बुद्ध इत्यादि) बोधिसत्व (अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, मैत्रेयी इत्यादि), तारा, कुबेर इत्यादि का क्रमविकास। जैन प्रतिमा विज्ञान : तीर्थंकर (आदिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ, महावीर), बाहुबली; अम्बिका, सरस्वती, यक्ष और यक्षी (जैन संदर्भ में) इत्यादि।

भारतीय मूर्तिकला : (पूर्व-आधुनिक घटनाक्रम) :


सिन्धु घाटी सभ्यता से गुप्त काल के बाद तक आरम्भिक भारतीय मूर्ति कला का विस्तृत अध्ययन राजवंश जैसे मौर्य, शुंग, सतवाहन, कुषाण, गुप्त, पाला-सेना, चन्देला, सोलंकी, परमार, चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट, गंगा, चोला, होसाला इत्यादि।

भारतीय वास्तुकला


प्रारम्भिक भारतीय वास्तुकला (प्राचीन साहित्य और शिल्प ग्रन्थों के संदर्भ में): सिन्धु घाटी; मौर्य स्तूप का उद्भव और विकास: भरत सांची, सारनाथ और अमरावती ।

शैल गुफाओं का क्रमविकास : (लोमस ऋषि, खंडगिरि, उदयगिरि, भाजे, कार्ले, कन्हेरी, अजन्ता, एलीफैंटा, एलोरा और मामल्लपुरम ) ।

मन्दिर वास्तुकला का क्रमविकास और नागारा, द्रविड़ और वेसार संवर्गों में उनका वर्गीकरण गुप्तकालीन मन्दिर; उड़ीसा में हुए विकास (परशुरामेश्वर, मुक्तेश्वर, लिंगराज और कोणार्क); चन्देला, प्रतिहार, परमार और सोलंकी मन्दिर शैलियां, चालुक्य, राष्ट्रकूट और होसाला मन्दिर वास्तुकला (जैसे कि विरूपाक्ष, कैलाशनाथ में, होयसलेश्वर); पल्लव एकाश्मीय और संरचनात्मक मन्दिर; चोला मन्दिर, कश्मीर में मार्तण्ड सूर्य मन्दिर ) | सलतनत और मुगल शासन के दौरान साम्राज्यिक वास्तुकला : प्रान्तीय इंडो-इस्लामी वास्तुकला की विशेषताएं, मुगल वास्तुकला (हमायूँ का मकबरा, फतहपुर सीकरी और सिकन्दरा, ताजमहल, लालकिला और जामा

मस्जिद) औपनिवेशिक और आधुनिक वास्तुकला : ली कोर्बुजिए, चार्ल्स कोर्रिया, बी. वी. दोषी एवं अन्य।


भारतीय चित्रकला (पूर्व-आधुनिक विकास)


प्रागैतिहासिक चित्रकला, अजन्ता में भित्तिचित्र और तत्पश्चात्र में भित्ति चित्रकला की परम्परा का विस्तार से अध्ययन उदाहरणार्थ बाघ, बादामी, एलोरा, सिट्टानावास, लेपाक्षी, केरल भित्ति चित्र जैसे मट्टनचैरी पैलेस आदि); पाण्डुलिपि चित्रकला और लघु चित्रों की परम्पराएँ : पूर्वी और पश्चिम भारतीय पाण्डुलिपियाँ, सलतनत चित्रकला (चौरपंचाशिका और पूर्व मुगलकालीन परम्परा), अकबर से शहांजहाँ तक मुगल लघु चित्रकला, राजस्थानी लघु चित्रकारी; पहाडी लघु चित्रकारी, दक्खिनी चित्रकारी (अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुंडा)।

आधुनिक भारतीय कला


भारतीय कला में आधुनिकता, रवि वर्मा, ई.बी. हैवेल, ए. के. कुमारास्वामी, स्टेला क्रेरिश, अवनिंद्रनाथ टैगौर और "बंगाल कला परम्परा"; नंदलाल बोस, बिनोदबिहारी मुखर्जी और रामकिंकर बैज, अमृता शेरगिल, जामिनी रॉय, 1940 के दशक के कलाकारों का समूह : कलकत्ता ग्रुप (कोलकत्ता), प्रोग्रसिव आर्टिस्ट ग्रुप (मुम्बई), दिल्ली शिल्पी चक्र (दिल्ली), चोलामंडल आर्टिस्ट विलेज (चेन्नई); स्वदेशवाद और 1950 और 1960 के दशक की प्रवृतियाँ 1970 के दशक से अमूर्तता की प्रवृतियां 20वीं और 21वीं शताब्दी में वैश्वीकरण की ओर समकालिक प्रवृत्तियां (उदाहरणार्थ संस्थापन, प्रदर्शन, डिजिटल / विडियो इत्यादि) और चयनित कलाकारों का अध्ययन।

पाश्चात्य कला


प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान समय तक पाश्चात्य कला का सिंहावलोकन: प्रागैतिहासिक कला, प्राचीन मिस्र

में कला, इजियाई कला, यूनान और रोम प्रारम्भिक-ईसाई और बाईजन्टिन कला, रोमनस्क्य और गौथिक कला, पुनर्जागरणकालीन चित्र और मूर्तिकला; मैनरिज्म तथा बारोक चित्र एवं मूर्तिकला, रोकोको, नव आभिजात्यवाद एवं रूमानीवाद; आधुनिक आंदोलन उदाहरणार्थ यथार्थवाद, प्रभाववाद, उत्तर प्रभाव, फोविस्म, अभिव्यक्तिवाद, क्यूबिज़्म, रचनावाद, भविष्यवाद, दादा और अतियथार्थवाद, अमूर्त अभिव्यक्तिवाद, ऑप कला, पॉप कला, उत्तर आधुनिक विकास उदाहरणार्थ अल्पतम और संप्रत्ययात्मक कला, फ्लक्सस आन्दोलन, आर्टे पोवरा, शारीरिक कला, भूमि और पर्यावरण कला, ग्रेफीटी, प्रक्रिया कला प्रदर्शन कला, संस्थापन, नव अलंकरण, घटना कला, नारीवादी कला और समलैंगिक कला।

प्राचीन निकट- पूर्व की कला


प्राचीन मैसोपोटेमिया (सुमेर, अक्कड़, बेबीलोनिया, अस्सीरिया) की दृश्यकलात्मक अभिव्यक्तियाँ; अक्मेनिङ और सासानी फारस में कला

सुदूर पूर्व केन्द्रीय और दक्षिण-पूर्व एशिया की कला भारत और अन्य प्राचीन संस्कृतियों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का आरंभ और विशिष्ट दृश्य अभिव्यक्तियों का आविर्भाव : प्राचीन चीन (शांग, झोऊ और हान राजवंश); टैंग राजवंश तक बौद्ध मूर्तियां, छह राजवंश और टैंग चित्रकला; सोंग से लेकर किंग तक चीनी परिदृश्य चित्रकला परंपरा; जापान (हानोबा कुंभकारी मूर्तियों की आकृतियां); नारा से लेकर कामाकुरा अवधि तक बौद्ध मूर्तियाँ); टेल ऑफ गंजी और हेयजी मोनोगोतारी एमाकी स्क्रोल्स समेत देर हेयान विधि और कामकुरा अवधि की चित्रकला; मोमोयामा तथा एडो काल में जापानी स्क्रोल चित्रकला; एडो काल से यूकिओ-इ-बुडलॉक प्रिंट्स; तिब्बत (बौद्ध प्रतिमाएँ और थांगका चित्रकला परम्परा); नेपाल (बौद्ध और ब्राह्मणिक मूर्तिकला और चित्रकला): श्रीलंका (मूर्तिकला और चित्रकला उदाहरणार्थ सिगिरिया भित्ति चित्र) : कम्बोडिया (मूर्तिकला और वास्तुकला, विशेष रूप से अंगकोर वाट और अंगकोर थोम) : जावा (मूर्तिकला और वास्तुकला उदाहरणार्थ, डायेंग पठार कैंडिस, दि वोरोबुदूर स्तूप, और प्रम्वनन परिसर): म्यांमार / बर्मा और सियाम / थाइलैंड इत्यादि में बौद्ध कला।

भारतीय लोक तथा जनजातीय कला


फड़, पिछवाई एवं कावड़ चित्रकला (राजस्थान) : बंगाल तथा उड़ीसा में पटुवा चित्रकला, मधुवनी / मिथिला चित्रकला (बिहार), वर्ली चित्रकला (महाराष्ट्र) : पिथौरा चित्रकला (गुजरात), ढोकरा कांस्य ढलाई, मन्नतार्थ चढ़ावे की टेराकोटा निर्मित आकृत्तियाँ (उदाहरणार्थ मन्नतार्थ घोड़े, जो भारत में विभिन्न राज्यों में चढ़ाए जाते हैं) लकड़ी पर नक्काशी और लकड़ी की गुड़ियाएं (काँडापल्ली, कर्नाटक, बंगाल, मध्यप्रदेश) चमड़े की कठपुतलियां (आंध्र प्रदेश, कर्नाटक) पारंपरिक और आधुनिक वस्त्र तथा प्रकार्यात्मक वस्तुएं (बनारस, कांचीपुरम, गुजरात, उड़ीसा और उत्तर-पूर्वी राज्यों के बस्त्र): बंधेज, कढ़ाई, कांथा, फुलकारी, चंबा रुमाल, धातु से निर्मित कला वस्तुएँ उदाहरणार्थ विदरी, ठप्पे का काम, मीनाकारी, आभूषण जैसे जडाऊ, मनके इत्यादि।

विकल्प - II रेखाचित्र और चित्रकला


सौंदर्यशास्त्र


रेखाचित्र तथा चित्रकला के मूलभूत तत्त्व, दृश्य कलाओं में बिम्बबिधान; दृश्य कला का उद्भव और विकास, कलाओं का वर्गीकरण, संकल्पनात्मक एवं दृश्यपरक यथार्थ ।

चित्रकला में सौन्दर्यशास्त्र के अध्ययन की प्रासंगिकता: भारतीय संस्कृति में प्रारम्भिक दार्शनिक विचार समाज

में कला की प्रकृति और कार्य

भारतीय सौन्दर्यशास्त्र : रस-सूत्र की संकल्पना और उसकी टीकाएँ : रस सिद्धांत, साधारणीकरण, ध्वनि, अलंकार, औचित्य इत्यादि; शिल्प ग्रंथ जैसे कि विष्णु धर्मोत्तर पुराण से चित्रसूत्र, कामसूत्र पर यशोधरा कीटीका के अंतर्गत षडांग इत्यादि। भारतीय सौन्दशास्त्र में ए. के. कुमारास्वामी और रवींद्रनाथ टैगोर का योगदान।

पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र : अनुकरण और प्रतिरूपण का सिद्धान्त, विरेचन (प्लेटो और अरस्तू)। कांट, हीगल, क्रोचे, टॉलस्टॉय, बॉमगार्टन, शॉफेनहॉर्वर, क्वाइव बेल, रॉजर फ्राई, आई.ए. रिचडर्स, सूजेन लैंगर, सिगमण्ड फ्रॉयड और जॉर्ज संतायान के सौंदर्यशास्त्रीय विचार।

रेखाचित्र एवं चित्रकला का इतिहास


भारतीय चित्रकला : भारत में प्रागैतिहासिक चित्रकला, अजंता, बाघ, बादामी और सिट्टानावासल के भित्ति चित्र पाल और पश्चिमी भारत की पाण्डुलिपि चित्रकला परंपरा। लघु चित्रकला की परंपरा: मुगलपूर्व, मुगल, राजस्थानी, पहाड़ी (बसोहली, गुलेर-कांगड़ा और गढ़वाल) और दक्खिनी चित्रकला (अहमदनगर, बीजपुर और गोलकुँडा)। कम्पनी स्कूल ऑफ पेंटिंग। राजा रवि वर्मा तथा अबनिन्द्रनाथ टैगोर और उनके शिष्य, नंदलाल बोस और उनके शिष्य का बंगाल स्कुल के जुड़ने से आधुनिक कला पदार्पण |

भारतीय चित्रकला में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ: अमृता शेरगिल का योगदान प्रगातिशील कलाकार समूह -

बम्बई, कलकत्ता ग्रुप – कलकत्ता, शिल्पी चक्र – - दिल्ली, चोला मण्डल मद्रास, और बड़ोदा स्कूल बड़ोदा ।

भारतीय कला में वर्ष 1970 से मुख्य देशीय प्रवृत्तियाँ, समकालीन चित्रकला और विख्यात कलाकार : प्रभाववादी, अभिव्यक्तिवादी, अमूर्त, अलंकरण, नव-तांत्रिक, आलंकारिक और गैर-आलंकारिक, अतियथार्थ, प्रतिरूपणात्मक तथा अप्रतिरूपणात्मक चित्रकला ।

पाश्चात्य चित्रकला : फ्रांस और स्पेन की प्रागैतिहासिक चित्रकला, मिथ और इजियाई कला, यूनानी और रोमन चित्रकला बाईजन्टिन, गौथिक, पुनर्जागरण, मैनरिज्म, बारोक, रोकोको, नवअभिजात्यवाद, रूमानीवाद, यथार्थवाद, प्रभाववाद, उत्तरप्रभाववाद, फौविस्म और प्रतीकवाद क्यूबिज्म, भविष्यवाद, दादा और अतियथार्थवाद, अभिव्यक्तिवाद, अमूर्त अभिव्यक्तिवाद, ऑप एवं पॉप कला, अल्पतम कला और उत्तर आधुनिक प्रवृतियाँ, नवीन मीडिया, संस्थापन एवं भ्रांतिक अति यथार्थवाद।


सामग्री और विधि


सामग्री का अनुप्रयोग, चित्रकला में आलंबन सामग्री (कैनवस, कागज, दीवाल सतह, पैनल्स), मिश्रित मीडिया तैल चित्रकला और उसकी तकनीक – पारम्परिक और गैर-पारम्परिक भित्ति चित्रकला की तकनीकें - पारम्परिक (भित्ति चित्रकला, सैको और ब्यूओनो) और आधुनिक वाटर कलर चित्रकला, धोने की तकनीक, पेस्टल और केयोन, ऐक्रेलिक रंग, रंग तैयार करना और वर्णकों का तकनीकी पक्ष रंग सिद्धान्त और रंग समरसता।
कला स्कूल और कलाशिक्षा

औपनिवेशिक काल में कला स्कूलों के माध्यम से कला में औपचारिक प्रशिक्षण का प्रारम्भ और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात चैन्नई, कलकत्ता, लाहौर, मुम्बई, दिल्ली, लखनऊ और जयपुर में कला विद्यालयों में कला आकादिमियों के माध्यम से कला उन्नति तथा शिक्षा; शान्तिनिकेतन और बड़ोदा में संस्थानिक कला शिक्षा पर पुनर्विचार कलाशिक्षा में कला दीर्घाओं और संग्रहालयों की भूमिका संग्रहालय, दीर्घा और कार्यरत कलाकारों और इतिहासवेत्ताओं के बीच सहयोग के रूप में संरक्षकीय क्यूरेटोरियल उद्यम में वृद्धि; जनता और कलाकार के बीच संवाद स्थापित करने में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

विकल्प III अनुप्रयुक्त कला


डिजाइन के तत्व एवं सिद्धान्त 'ग्राफिक डिजाइन' शब्द और विलियम एडीसन डिगिंग्स, ग्राफिक डिजाइन / अनुप्रयुक्त कला के मूलाधार इमेज और टेक्स्ट: उत्पाद के प्रचार-प्रसार के लिए संदेश तैयार करना। विज्ञापन उद्योग से संबंधित पद तथा शब्दावली: संयुक्त पदों की समझ उदाहारणार्थ ऐडवर्टोरियल, इंफोग्राफिक्स, इंकामर्शियल, एडुटेन्मेंट इत्यादि।

नवप्रवर्तन और आन्दोलन : भारत और विश्व के अन्य देशों में विज्ञापनकला का इतिहास, सुलेखनकला, मूवेबल

टाइप्स का आरंभ टाइपफेसेज, फोंट्स एवं फैमिलीस अक्षरों का विन्यास और रचना; टाइपों और आकार के

वर्गीकरण। आरंभिक टाइप मुद्रणविद और पारंपरिक हस्त लेखन तथा लिपि का अध्ययन, उदाहरणार्थ भारतीय

पांडुलिपियाँ, फारसी, चीनी, जापानी, रोमन इत्यादि। भारत में और शेष विश्व में मुद्रण प्रक्रियाओं का विकास :

लेटरप्रेस, उत्कीर्णन, सिल्क स्क्रीन और ऑफसेट इत्यादि।

ग्राफिक डिजाइन को प्रभावित करने वाले आन्दोलन : आर्ट नूवो, दि आर्ट ऑफ वार, कला के बाद : भविष्यवाद, दादा, डेस्टेज्ल, और रचनावाद, कला एवं शिल्प आंदोलन, बौहॉस आंदोलन और नूतन टाइपोग्राफी, ग्राफिक डिजाइन का इतिहास और विज्ञापन इतिहास की प्रकृति, दृष्टांतपरक आधुनिकता और चेतना प्रसार, नवीन

लहर एवं उत्तर आधुनिकतावाद, डिजिटल अभिव्यक्तिवाद एवं पश्चलेख, द डिजिटल फ्यूचर

विज्ञापन की विधाएँ और मीडिया


मुद्रित आउटडोर, इलेक्ट्रोनिक एवं नवीन मीडिया विज्ञापन मीडिया विकल्प: समाचार पत्र और पत्रिकाएं, रेडियो, टी.वी. और सिनेमा, पोस्टर, डायरेक्ट मेल, परिव्यापक और गोरिल्ला विज्ञापन, डिजिटल और ऑनलाइन विज्ञापन वाइरल विज्ञापन आउटडोर विज्ञापन में तेजी बिलबोर्डस और ट्रांजिस्टम, : नवप्रवर्तनकारी सामग्रियां और लाभ।

कला की एक नई विधा के रूप में पोस्टर का उद्भव: पौलैंड, जापान, ईन्गलेन्ड तथा अमेरिका एवं बोल्शेविक रूस के संदर्भ में पोस्टरों का अध्ययन प्लेकार्ड्स और अधिप्रचार विरोध तथा युद्धकालीन पोस्टर्स, भूतलमार्ग संस्कृति ।
विज्ञापन की प्रावस्थाओं के सांस्कृतिक स्वरूप : मूर्तिपूजा, प्रतिमाशास्त्र, आत्मरति, तथा टोदमवाद (चतुर्थ सांस्कृतिक फ्रेम) से मिसेन-सीन (पंचम फ्रेम) तक संक्रमण, पारम्परिक से औद्योगिक से उपभोक्ता समाज तक क्रमविकास और संचार मीडिया का विकास विज्ञापन तथा विज्ञापन एजेन्सियों का भविष्य विज्ञापन और मनोरंजन के बीच विभाजक रेखाओं का धुंधला पड़ना।

उन्नत प्रौद्योगिकी युक्त ग्राफिक डिजाइन का प्रभाव, "ग्राफिक डिजाइन" को पुनः परिभाषित करना। आधुनिक डिजाइनरों में अपेक्षित विशेषताएं।

डिजाइन, कैंपेन और पैकेजिंग


'लोगो' 'रिबस', प्रतीक, चिह्न और कार्पोरेट पहचान का डिजाइन तैयार करना; विश्व में सर्वाधिक सुविख्यात प्रतीकों / पहचानों के विकास की कहानियाँ; ब्रांडस्, रिम्नांडिंग और ब्रांड पोजिशनिंग, विज्ञापन के सिद्धान्तों और नियमों के अग्रदूत तथा भविष्यवक्ता, डिजाइनिंग इवेंट्स इवेंट मैसकोट तथा अन्य वैश्विक मनोरंजन, फिल्म तथा उत्सव।

कैंपेन नियोजन और कार्यनीति ग्राहक बाजार शोध, लेखा नियोजन, रचनात्मक सारपत्र (ब्रीफ), मुद्रित विज्ञापनों (समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं) के लिए दृश्य और लिखित सामग्री तैयार करना, प्रत्यक्ष डाक, पोस्टर, आउटडोर विज्ञापन (बिलबोर्ड्स और ट्रांजिट्स), क्रयविक्रय, शो- विंडो तथा सुपर मार्केट की मदें (विक्रयस्थल/ खरीद मदों के क्रयस्थल, डिस्पेंसर्स, स्टैंड्स, स्टॉल्स इत्यादि)

मीडिया चयन उपागम और लक्षित ग्राहक। मीडिया में नवप्रर्वतन नूतन प्रौद्योगिकियां, टी.वी. ग्राफिक्स,

मल्टीमीडिया प्रस्तुतिकरण, वेबपेज डिजाइनिंग और रेक्टर तथा वेक्टर सॉफ्टवेयर की समझ इंटरनेट

विज्ञापन उत्पादों एवं सेवाओं में इसका उपयोग, इंटरनेट पर क्रय-विक्रय

प्रीप्रेस, प्रिंटिंग प्रेसस और प्रोस्ट प्रेस पिक्सल और रेजलूशन का कौशलपूर्ण उपयोग, रंग परिष्करण, कंप्यूटर से प्लेट ग्राफिक तक तैयार करना, ऑफसेट प्रिंटिंग, फिनिशिंग एवं कॉनवर्टिंग योजक और वियोजक, चार रंग मुद्रण क्रियाविधि, स्पॉट कलर तथा लेमीनेशन, यू.वी. इत्यादि। पैकेजिंग का डिजाइन, क्रयविक्रय और नयापन।

विज्ञापन कार्पोरेट और नवीन प्रवृतियां

विज्ञापन एजेंसियों का उद्भव और विकास ग्राफिक डिजाइनर की भूमिका और दायित्व, सर्जनात्मक कोर : सर्जनात्मक / कला निर्देशक, बिजुअलाइजर, तथा कॉपीराइटर, संकल्पना विकसित करने में अंतःक्रिया।

विश्व के अग्रणी विज्ञापन कोरपोरेट्स, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और भारतीय परिदृश्य : अखिल भारतीय शाखाओं वाली भारतीय विज्ञापन एजेन्सियां। ऐड-गुरू या उल्लेखनीय ऐड-मैन और उनके द्वारा संचालित युग-प्रवर्तक विज्ञापन कंपेन विज्ञापन सर्जनात्मकता और असाधारण योगदान के लिए पुरस्कार तथा उच्चतम सम्मान |
ब्रांडिंग के क्षेत्र में विश्व के विख्यात् डिज़ाइनर्स और कोर्पोरेट पहचान डिजाइन, फिल्म शीर्षक कला के विषय शाखाओं के साथ अंतः विषयी सहभागिता, उद्योगों और कोर्पोरेटों के साथ सहयोग और इंटर्नशिप

नवीन दृश्य प्रभाव उत्पन्न करने में कंप्यूटर की भूमिका ( फोटोग्राफी, डिजिटल ग्राफिक्स फिल्म शीर्षक)

मल्टीमीडिया प्रस्तुतिकरण, इमेज सम्पादन, वेब ग्राफिक्स और ऑनलाइन विज्ञापन के प्रकार, वेब पेज

डिजाइनिंग); विज्ञापन में बाजार शोध का महत्व प्रिंट मीडिया बनाम इलेक्ट्रोनिक मीडिया।

विकल्प - IV: छापाचित्रण (ग्राफिक कला)


सौन्दर्यशास्त्र और इतिहास


दृश्य कला के मूलभूत तत्वों (स्थान, रूप, आकार, आकृति, रेखा, रंग, बनावट, रंग सामंजस्य भान, परिप्रेक्ष्य, और सौन्दर्यबोध) को प्रिंटमेकिंग के सम्बन्ध में समझना।

संघटन (अनुपात, एकता, समरसता, लय, वैषम्य, संतुलन और ध्यान देना) के दृश्यपरक सिद्धांतों को समझना। द्विआयामी समरूप प्रिंट्स का पुनरुत्पात्पन

एशिया और यूरोप में छापाचित्रण (प्रिंट मेकिंग) की प्रक्रिया, तकनीक और सामाग्रियों के इतिहास, अविष्कार,

विकास और परिभाषा का ज्ञान। जापानी काष्ठ सांचे और उकिओ-इ-स्कूल के महत्त्वपूर्ण निष्णात कलाकार और

होकुसाई, हिरोशिगे, उतमारो इत्यादि निष्णात कलाकारों की कृतियां।

19वीं 20वीं शताब्दी के दौरान सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के ढंग के रूप में प्रिंट मेकिंग- पुस्तक उत्पादन से लेकर

शिल्पागार / कार्यशालाओं, समूहों, प्रयोगों की स्थापना तक तथा विज्ञापन पर प्रभाव।

ढंग, माध्यम एवं प्रक्रिया

छापाचित्रण तकनीकों के प्रकारों का ज्ञान (i) काष्ठ फलक सांचा और लाइनोफलक (ii) उत्कीर्ण छपाई-काष्ठ और धातु (iii) उत्कीर्णन (एचिंग) लाइन, एक्काटिंट, साफ्टग्राउंड, इत्यादि (iv) सतह प्रिंटिंग (प्लेनोग्राफी), ऑफसेट, ऑलियोग्राफ इत्यादि (v) स्टेंसिल और सेरीग्राफ (vi) अन्य तकनीके- कोलोग्राफी, चिने-कोल्ले, मोनोप्रिंट, यूनीक प्रिटं, ड्राई प्वायंट, उत्कीर्णन, मेज़ोटिंट, बिस्कोसिटी, डिजिटल इमेजिंग, मिश्रित माध्यम इत्यादि।

छापाचित्रण में प्रयुक्त भिन्न प्रकार के माध्यमों, सामग्रियों (काष्ठ, लिनो, तांबा, जस्ता प्लाइवुड, पत्थर, ऐक्रेलिक, कागज, कार्डबोर्ड, गोंद, अम्ल, रसायन, स्याही, रेसिन, सॉफ्टवेयर, औजार, मशीन, उपकरण इत्यादि) और प्रिंटिंग प्रक्रिया का ज्ञान प्रिंटिंग होने तक सामग्री की पहचान से लेकर मुद्रण तक डिजाइनिंग करना और विभिन्न प्रकार की सतहों की तैयारी।
कला कृतियां

भूतकाल से लेकर आधुनिक काल तक के महान प्रिंट निर्माताओं की कृतियों और छापाचित्रण के विकास में उनका योगदान उदाहरणार्थ ड्यूरर, रैम्ब्राण्ट, होगार्थ, गोया, गॉग्विन देगा, लौट्रेक, डॉमियर, जर्मन अभिव्यक्तिवादी (कैथ, कोलविट्स, नोल्ड, हैकल, ग्रस्ज़, मंच इत्यादि), पिकासो, पॉप और प्रतीकवादी कलाकार (रॉशनबर्ग, लिचेंस्टीन, जिम डाइन), डेविड होकने, कृष्णा रेड्डी, पीटर डग्लिश, स्टेनले जोन्स, पॉल लिंगरेन, कैरोल समर्स इत्यादि ।

भारत में प्रिंटमेकिंग का विकास, औपनिवेशिक काल की अवधि में अँगरेजों का योगदान तथा प्रभाव, प्रेस तथा

स्कूलों की स्थापना 19वीं शताब्दी के मध्य से लेकर स्वतन्त्रता पूर्व काल तक लोकप्रिय प्रिंटमेकिंग। स्वतन्त्रता

पश्चात भारत में प्रिंटमेकिंग की प्रवृतियां।

भारतीय प्रिंट निर्माताओं का योगदान राजा रवि वर्मा, विचित्र क्लब के सदस्य, मुकुल डे, गंगेद्रनाथ टैगोर इत्यादि, शांतिनिकेतन स्कूल, नंदलाल बोस, बिनोद बिहारी मुकर्जी, रामकिंकर, विश्वरूप वोस, रमन चक्रवर्ती, हरेन दास, सोमनाथ होर, चित्ता प्रसाद, ज्योति भट्ट, कंवल कृष्ण, देवयानी कृष्णा, बाई के शुक्ला, वसन्त परब, जगमोहन चोपड़ा, परमजीत सिंह, ललिता लाज़्मी, नैना दलाल, लक्ष्मा गौड़, आर.बी. भास्करण, आर. एम. पल्लानिअप्पन, सनतकार, लालू प्रसाद शॉ, अभिताभ बनर्जी, देवराज डाकोज़ी, भूपेन खखर, वामन चिंचोल्कर, पॉल कोली, दीपक बनर्जी, जय जरोटिया, प्रयाग झा, रीनी घुमाल, अनुपम सूद, जयन्त पारिख, कंचन चंदर इत्यादि।


प्रिंट एवं मुद्दे


अच्छी गुणवत्ता वाले प्रिंट मानदण्ड (तकनीकी रूप से और सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से), प्रिंट्स की प्रामाणिकता की पहचान करने की लिए परिपाटियाँ हस्ताक्षर, संस्करण, कलाकार का प्रमाण इत्यादि। प्रदर्शन प्रिंट्स की माउंटिंग और उनका परिरक्षण समसामयिक प्रिंटमेकिंग से सम्बन्धित विभिन्न मुद्दे (यांत्रिक उत्पादन, कंप्यूटर ग्राफिक्स, विज्ञापन के प्रभाव, शिल्पागार कार्यशालाएं और समूह इत्यादि)

विकल्प V : मूर्तिकला


मूर्तिकला के तत्व एवं सिद्धान्त


मूर्तिकला के मूलाधार और तत्व, मूर्तिकला में बिंबविधान का उद्भव एवं विकास, मूर्तिकाल का वर्गीकरण; मूर्तिपरक स्वरूप बनाम संकल्पनात्मक यथार्थ।

मूर्तिकला-वृत्ति के लिए सौंदर्यशास्त्र के अध्ययन का औचित्य भारत और पश्चिमी देशों में प्रारम्भिक दार्शनिक

विचार; समाज में मूर्तिकला की भूमिका एवं कार्य ।

पाश्चात्य एवं प्राच्य परम्पराओं में मूर्तिकला का इतिहास; समाज में गिरजाघरों, मन्दिरों और धर्मनिरपेक्ष इमारतों जैसी वास्तुकलात्मक संरचनाओं के अंतरंग भाग के रूप में पारम्परिक मूर्तिकला सम्बन्धी कार्यक्रम ।
मूर्तिकला-वृत्ति से संबंधित स्वरूप सामग्री, विधियों और तकनीकों का अध्ययन मूर्तिकला से सम्बन्धित शब्दावलियों की समझ की स्पष्टता।

मूर्तिकला-वृत्ति में विविध माध्यमों का अध्ययन


1. क्ले और मोम


मूर्तियों के लिए प्राकृतिक क्ले की तैयारी, क्ले की सहायता से मॉडलिंग और कास्टिंग, टैराकोटा तथा क्ले को पकाना; भट्टों के प्रकार सिरामिक कृतियों के काम में रंगों और वर्णकों की श्रृंखला सीमा की संभावनाएँ; क्ले निर्मित मूर्तियों में द्वि-आयामी तथा त्रि-आयामी विधियाँ, मोम में मॉडलिंग एवं उत्कीर्णन। प्लास्टर ऑफ पेरिस (पी ओ पी)

पी ओ पी का इतिहास, रासानियक संघटन और भौतिक प्रकृति पी ओ पी के प्रयोग के लाभ और नुकसान; त्वरित एवं मंद करने वाले एजेन्ट; पी ओ पी का सतही उपचार; पी ओ पी में ढलाई एवं काष्ठ की प्रकृति एवं विभिन्न प्रकार, उत्कीर्णन के औजार और काष्ठ की मूर्ति बनाने के लिए उत्कीर्णन की

उत्कीर्णन। 3. काष्ठ

विधियाँ, काष्ठ की सीजनिंग और परिरक्षण; काष्ठ का परिष्करण और अभिरंजन।

4. पत्थर पत्थर में मूर्ति बनाने की शुरुआत औजार एवं उपकरण, पत्थर पर नक्काशी के लिए प्रासंगिक विधियां

और उपागम, अपक्षय से बचाने के लिए पत्थर का उपचार एवं परिरक्षण

5. धातु धातु की मूर्तियों का इतिहास; मूर्ति हेतु माध्यम के रूप में धातु के उपयोग में निहित प्रक्रियाएं, लौह एवं अलौह के रूप में धातुओं का वर्गीकरण और उनके भौतिक गुणधर्म, मिश्रधातु, इत्यादि प्राथमिक मूर्ति धातु के रूप में कांस्य; लौस्ट-वैक्स पद्धति (मोम-सांचा विधि), ग्रेविटी कास्टिंग, सैण्ड कास्टिंग, इत्यादि देशीय पद्धतियाँ, धातुओं के गलनांक, सतह उपचार जैसे कि, ऐनोडीकरण, आक्सीकरण तथा पैटिनीकरण, धातुओं के साथ काम करने के लिए वेल्डिंग एवं फोर्जिंग विधियाँ: धातु की मूर्तियों का परिरक्षण।

6. संयोजन तथा संस्थापन


मिश्रित माध्यमों का इतिहास एवं पृष्ठभूमि 1960 के दशक के नवसंकर रूप और निकट हाल के विकास: सार्वजनिक मूर्तियाँ, पर्यावरणीय कला

स्मारकीय मूर्तियां

विषय क्षेत्र, समस्याएँ, सीमाएँ, संकल्पना और विकास प्रतिष्ठित प्रतिपादक, उदाहरणार्थ डी.पी. रॉय चौधरी, रामकिंकर बैज, प्रोदोष दास गुप्ता, संखो चौधुराय, पीलू पोचखांवला, चिंतामणि कार, सरबरी रॉय चौधरी, अमरनाथ सहगल, धनराज भगत, कनाई कुन्हीरमन, एमधर्माणी, नागजी पटेल, बलबीर सिहं कट्ट
समकालीन भारतीय मूर्तिकार :

नवीन सामग्री और तकनीकों के साथ देशीय ज्ञान का संयोजन चयनित व्यक्ति – बी.सी. सान्याल, सोमनाथ होर, के.जी. सुब्रामणियम, बीमान बी.दास, मीरा मुखर्जी, राघव कनेरिया, हिम्मत शॉ, लतिका कट्ट, जेराम पटेल, अजीत चक्रवर्ती, सुशेन घोष, सतीश गुजराल, वेद नायर, पी. वी. जानकीराम, शिव सिंह, बालन नांबियर, एस.नंदगोपाल, महेन्द्र पांड्या, रजनीकांत पांचाल, मृणालिनी मुखर्जी, के.एस राधाकृष्णन, एस. नंदगोपाल, ध्रुव मिस्री, प्रितपाल सिहं लाडी, अनिता दूबे, रवीन्द्र रेड्डी, एन. एन. रिमज़ोन, पुष्प माला एन, सुदर्शन शेट्टी, सुबोध गुप्ता, अनीश कपूर इत्यादि।

चुनिंदा आधुनिक एवं समसामयिक पाश्चात्य मूर्तिकारों का योगदान होनोर डैमियर, अगस्टे रोडिन, केमिली क्लोडल, पॉल गॉग्विन, अरेस्टाइड मेलौल, ऐंट्वायन बौरडेले, हेनरी मेटिस, अर्न्स्ट बरलाच, कंस्टेंटिन बैंकुसी, पाब्लो पिकासो, अलक्जेंडर आर्किको, रेमंड दुनैम्प विलन, जैक्स लिस्विट्सज, हेनरी लॉरेन्स, अमबेटों बनी, व्लादिमीर टैट्लिन, नौम गावो, सोफ़ी टॉवर, जीन आर्य, मैक्स अर्न्स्ट, एंट्वायन पेखर, एलैक्जेंजर काल्डर, हेनरी मूर, बारबरा हैपवर्थ, डेविड स्मिथ, लुईस बुर्जुआ, इसामु नोगुची, अल्बर्टो जेकोमेटी, सीजर, मेरीनो मरीनी, लसिओ फॉन्टाना, जॉर्ज सीगल, क्लिज ओल्डेनबर्ग, एंथनी कारो, टॉनी स्मिथ, डोनाल्ड जड, कार्ल आंद्रे, एवा हेसे, ड्वेन हंसन, जूडी शिकागो, जोएल शेपीरो, बैरी फ्लेनागन, जॉर्ज बेसेल्स, जिमी डरहम, जेफ कून्स, किकी स्मिथ

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