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कथनी करनी

  सुबह का समय था सूरज अपने श्वेत अश्व वाले रथ पर बैठकर अभी दिन की सैर पर निकलने वाला ही है सारा परिवेश उसकी लालिमा से युक्त हो गया है पेड़ पौधे भी इस अद्भुत दृश्य को अपने हृदय में चित्र की भांति बैठाने के लिए आंखें गडा कर बैठे हैं पशु पक्षी सभी अपने नित्य कार्यों पर जाने को तैयार हैं तभी एक बंदर आकर राजा साहब का संदेश सुनाता है आज राज्य में कई महापुरुष पधारे हैं जिनके मात्र विचारों के श्रवण से आप सभी के सारे दुख दर्द दूर हो जाएंगे
     राज्य की सारी प्रजा बंदर भालू चिटी हिरण आदि एकत्र हुए विद्वान मंडली के लिए सजे हुए पंडाल को देख लोग सम्मोहित हो रहे थे पदों पर पच्चकारी का कार्य उस पर पड़ता प्रातः कालीन प्रकाश अद्भुत दृश्य निर्मित कर रहा था लोगों को वैकुंठधाम का भ्रम उत्पन्न हो रहा था राजपुरोहित आकर राजा के स्वागत में जय जयकार के नारे लगाते हैं राजा सिंहासन आसीन होकर सभा को प्रारंभ करने का आदेश देता है राजा के मुंह पर एक अभिमान की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी वह मन में विचार कर रहा था कि आज कितना शुभ दिन आया है राज्य के सारे कर्मशील व्यक्ति एक साथ एकत्र होने होकर लोगों को धर्म-कर्म के महत्व को बताएंगे जिससे प्रजा का कल्याण होगा मेरा यस तीनों लोकों में फैलेगा का यह सोच कर गदगद हुआ जा रहा था
     सभा में पधारे सारे महापुरुषों को प्रतियोगिता के आधार पर चुना गया था पुरोहित ने सबसे पहले बंदरों के प्रतिनिधि को बुलाया
       बंदरों की इस प्रतिनिधि के चेहरे पर अजीब सी चंचलता प्रगट हो रही थी आंखें चमक रही थी मानव वर्षा ऋतु में बिजली की चमक को मलीन कर रही हो साधारण पोशाक अपने ज्ञान पर भरपूर विश्वास बंदर मन में विचार करते हुए कहता है यह विधि का ही विधान है जो राजा के द्वारा आज मुझे इतना बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ है राज्य की सारी जनता को अपनी अमृत मय वाणी से तृप्त कर दूंगा आज के बाद ऊंच-नीच जात-पात जैसी भावनाएं समाज में नहीं दिखाई देंगी ऐसा अगर मैं सोचता हूं तो मेरे मेरा यह अभिमान नहीं है मेरे अध्ययन की पराकाष्ठा है जिसके लिए जीवन के इतने वर्ष लगा दिए इतने वर्षों में सैर सपाटा तो छोड़ ही दें जीवन के सारे  सुखों का त्याग कर एक सजा यातना कैदी की भांति बिता दिए तब जाके यह सिद्धि प्राप्त हुई है अगर मैं इस पर घमंड भी करूं तो किसी को परेशानी क्यों हो आखिर किसी से उधार तो नहीं ली है इस प्रकार के अंतः संवाद से स्वयं को अलग करते हुए बोला
    संसार दुखों से भरा पड़ा है दुख प्रतीत सत्य हैं जो हमें दिखाई देते हैं पर सुख तो वह परम आनंद है जो केवल अनुभव किया जा सकता है अतः मेरा मानना है सभी को आनंद को बढ़ाना चाहिए जिससे सारी प्रजा सुखी हो जाएगी वंदन ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा अगर आपको धूप लगती है तो किसी पेड़ की छांव में चले जाओ अब कैसा अनुभव करोगे आप सभी मुझे बताओ सारी भीड़ ने एक सुर में कहा शीतलता का अनुभव होगा  ऐसे ही जीवन में दुखों से लड़ना बंद करो उन्हें छोड़ दो आनंद की शरण में आओ समृद्धि प्राप्त करो सारी प्रजा जय-जय कारों के नारों से गूंज उठती है पर पास में बैठा भालू इस वृत्तांत को सुनकर दुखी हो जाता है और भीड़ की संकुचित मानसिकता पर न ही हस सकता था न हीं रो सकता था बस शोक प्रकट कर रहा था
  अब चीटियों की बारी थी वह आकर बोली आप मेरे आकार पर मत जाइए मेरे द्वारा किए गए कार्यों के विषय में विचार करो तो सही मैं ही केवल अपने आकार और वजन से अधिक भार उठा सकती हूं इस संसार में उसके चेहरे की कांति उसके जोश कुछ छिपा न पा रही थी उन्नत ललाट सुंदर केस सौंदर्य को कई गुना बढ़ा रहे थे जैसे धुरू तारे में छोटे-छोटे तारे अपने लालित्य का तेज भर रहे हो चींटी ने अपनी बात कुछ इस प्रकार की संसार कर्म के अधीन है जैसे कर्म करो वैसे ही फल मिलेगा भगवान कृष्ण ने गीता में भी कर्म की महत्ता का बोध किया है कर्म के द्वारा मानव जीवन में सब कुछ हासिल कर लेता है जो व्यक्ति लगकर संपूर्ण समर्पण के साथ अपने कर्मों का निर्वहन करता है वह केवल संसार के चक्र को आगे नहीं बढ़ाता ईश्वर के संदेश को लोगों तक पहुंचाता है इस प्रकार चिटी ने अन्य कई उदाहरणों से कर्म की महत्ता का बखान किया और सारे दुखों का कारण कर्म हीनता को माना ऐसे ही लंबे लंबे तर्कों से प्रजा में खूब  वाहवाही बटोरी
    अब बारी हिरण की थी भला वह इस प्रतियोगिता के दौर में पीछे कैसे रह सकता था उसकी चाल ढाल और तीखे नैन नक्श देखकर भला किसका ध्यान नहीं विचलित होगा उस पर से ईश्वर ने ज्ञान का अथाह भंडार दिया है वह ऐसे प्रतीत हो रहा है जैसे प्रातः कालीन उदित होते सूर्य को सागर ने आत्मसात कर लिया हो उसने अपना प्रवचन करने से पहले मन में सोचा आज मेरी भाषा कुशलता की परीक्षा है ऐसा क्या करूं जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे मैं हर प्रकार से सक्षम हूं तभी तो यहां पर हूं वरना भीड़ में खड़ी हो होकर जय जयकार का नारा लगाता आज मुझे इसी हुनर  को सिद्ध कर अपनी श्रेष्ठा को स्थापित करना है यह विचार करते हुए बोला राजा समाज का आधार होता है मैं यह बोलने से पहले यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं किसी की प्रशंसा नहीं कर रहा हूं जो सत्य है वही बतला रहा हूं राजा के गुणों को प्रजा अगर अनुकरण करेगी तो उसका कल्याण होगा क्योंकि राजा पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि होता है प्रजा को चाहिए जैसे वह ईश्वर के बिना कहे उसकी पूजा-अर्चना करता है प्रसाद चढ़ाती है वैसे ही प्रजा राजा के आदेश का पालन करें जो भी उत्पादन करें उनमें से निश्चित मात्रा में ईमानदारी के साथ राजकोष में कर के रूप में जमा करा दें
     ऐसा करने से राजा और प्रजा के बीच के संबंध मधुर होंगे जहां संबंधों में प्रगाढ़ता होती है वहीं विश्वास होता है वहां ही लक्ष्मी जी का वास होता है आप सभी जानते हैं जहां लक्ष्मी जी रहती है वहां पर सदैव धन की वर्षा होती है मेरा मानना है आप सब इस धन वर्षा का आनंद अवश्य उठाना चाहेंगे प्रजा ऐसी बातों पर मोहित हो गई और जय जयकार होने लगी हिरण ने राजा की ओर देखा राजा मुस्कुराया वह राजा की मुस्कान का रहस्य समझ गया था हिरण ने एक तीर से दो लक्ष्यों पर निशाना साध कर अपनी वाकपटुता का सबूत दे चुका था
    अब भालू का नंबर आया वह लोगों को प्रणाम कर बिना कुछ बोले ही जाने को तत्पर हुआ उसकी भाव भंगिमा देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसका शरीर उसके सिर का भार नहीं उठा पा रहे हो इस पर उसके संप्रदाय के लोगों ने बढ़ा ही हु हल्ला क काटा बेचारा द्रवित हृदय से एकांत में चला गया
     सभा समाप्त हुई राजा ने तीनों प्रकांड विद्वानों को सम्मानित किया और अपनी राज्य के देखरेख की जिम्मेदारी दी तीनों ने राजा से कहा राज्य को बड़ी ईमानदारी कर्तव्यनिष्ठा के साथ चलाएंगे प्रत्येक नागरिक को ऐसी सुविधाएं मुहैया कराएंगे जो देवताओं को भी नसीब ना होती है राजा को उन पर पूर्ण भरोसा हो गया राज्य का सहारा भार तीनों के कंधों पर छोड़कर राजा भोग विलास में डूब गया
   थोड़े ही समय में सभी लोग जा चुके थे अभी सभी लोग घर जा ही रहे थे तभी एक बंदर ने भालू को वृक्ष के नीचे देखा तो पास आकर बोला आप यहां क्यों बैठे हैं आप तो परम ज्ञानी हैं शास्त्रों वेदो के जानकार हैं कर्मशील हैं सभी में श्रेष्ठ हैं समाज में बड़ा सम्मान है तो आज चुप क्यों रहे इतना बड़ा अवसर क्यों जाने दिया भालू थोड़ी देर की शांति के बाद बड़े ही करुण स्वर में बोला पता है तुम्हें संसार में कौन लोग आदर और सम्मान से देखे जाते हैं जो आदर्शों की लंबी-लंबी दीवारों में साधारण जनों को कैद कर लेते हैं यह तो सर्वविदित है आदर्श कभी भी व्यवहार में नहीं उतारे जा सकते हैं तो मैं कैसे न हासिल होने वाली इस दुनिया का ज्ञान अपने लोगों को दे सकता आखिर मरने के बाद ईश्वर को भी मुंह दिखाना है इसका इतिहास गवाह है संसार केवल अच्छी बातों से ही नहीं चलता वरन उसके लिए अच्छे कर्म भी करने पड़ते हैं जो व्यक्ति जिस प्रकृति का होता है उसे वही दिखाई पड़ता है सत्य को नहीं पहचानता अब इसमें राजा को दोष क्या देना बंदर बोला है श्रीमान मैं आपका आशय नहीं समझ पा रहा हूं समय के साथ समझ जाओगे 1 महीने तक तुम इन तीनों की गतिविधियों पर नजर रखो
   बंदर लगातार भालू के कहे अनुसार प्रतिदिन बड़ी लगन और तन्मयता के साथ लगा रहा समय समाप्त होने के पश्चात पुनः भालू के पास आकर एक-एक करके सारी स्थिति बताइ
     बंदर सुबह देर से उठता है तब तक उसे सेवक नाना प्रकार के व्यंजन बनाकर तैयार रखते हैं सुगंधित द्रव्य से युक्त जल से स्नान कर कहारों को पालकी लाने का आदेश देता है और पालकी में सवार होकर प्रति दिन आमोद प्रमोद के कार्यक्रमों लगा रहता है अपना जीवन व्यतीत कर रहा है ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे जीवन के सारे आनंद ईश्वर ने इसी की झोली में डाल दिए हो भला मेरी किस्मत ऐसी कहां केवल दुःख ही दुख कहते-कहते बंदर चिंता ग्रसित हो गया जो उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी
   थोड़ी देर बाद बोला चींटी के तो कहने ही क्या साहब सारा दिन तो संगीत नृत्य में बिता देता जो समय बचता उसे मदिरालय में क्या श्रेष्ठ जीवन मिला है महाशय इन्हें तो रहने दो हिरण के क्या कहने जब से पदभार ग्रहण किया है कर का संग्रह कई गुना बढ़ चुका है भगवान ऐसी बुद्धि सभी को दें
     भालू बंदर के अंदर की तृष्णा को तर्कों से शांत करने का प्रयास करता है तुम केवल वह देख रहे हो जो तुम्हें दिखाया जा रहा है मैं बारी बारी से स्पष्ट करता हूं बंदर जो लोग कष्टों से छुटकारा दिलाने की बात करते थे आज वही कितने भोग विलास में डूबे हैं सारी चीजो के होते हुए भी उनके पास पर उनके चेहरे पर असंतुष्टि का भाव  है जब तक व्यक्ति के हृदय में तृष्णा का वास होगा संतुष्टि उसके नजदीक भटक भी नहीं सकती और असंतुष्टि ही सभी प्रकार के दुखों की जननी है जो व्यक्ति स्वयं दुखों की खान हो वह भला दूसरों को सुख कैसे प्रदान कर सकता है ऐसे लोग जिस राज्य का नेतृत्व करेंगे उसका पतन निश्चित है उसे स्वयं भगवान भी नहीं बचा सकते
    चींटी जो कर्मों पर गीता जैसे पवित्र ग्रंथों की कसमें खाती थी वह आज कर्म के सारे अर्थों को ही भूल गई है मगर आज भी अपनी प्रवृत्ति के अनुसार दूसरे के दोष गिनाने में प्रवीण है वह तो ऐसा अंधेरा है जहां प्रकाश भी जाने से डरता है भला जनता इन्हें देखकर किन कर्मों का निर्वहन करेगी अगर ऐसे व्यक्ति जिस शासन की बागडोर संभालते है तो हो चुकी राज्य की सीमाओं की सुरक्षा और बढ़ चुका साम्राज्य चींटी जैसे चाटुकार लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि में जनता का अनुचित शोषण करते हैं एवं अधिक  करो को वसूल करते हैं ऐसे चाटुकार लोगों से गिरा हुआ राजा सदैव अपयश का मार्ग चुनता है
    इसीलिए मैं तुमसे कहता हूं जब तक स्वयं अपने बनाए नियमों का पालन नहीं करो तो लोग कुछ समय के लिए आपकी वाकपटुता के प्रभाव में भले ही श्रेष्ठ माने पर ईश्वर आगे का मार्ग अपयश का ही निर्धारित करेगा यह जान लो किसी को बुरा कहना आसान है पर अच्छा बनना बहुत कठिन ऐसे खोखले आदर्शों का निर्वाह जिस समाज में होता है उसका पतन निश्चित है इसीलिए मैं कुछ ना बोल सका क्योंकि मुझे अपनी माटी से प्यार है भला अन्याय कैसे कर सकता था उसके पतन में भागी कैसे बन जाता कम से कम यस ना सही अपयश का तो भागीदार नहीं बनूंगा
       भला आप ही बताओ इस स्थिति में मैं किसे और क्या सुनाता जब किसी को सभा के मूल उद्देश्यों की फिक्र ही नहीं थी यहां पर न्याय की बातें करना मात्र छलावा है  हां इतना जरूर है अगर मैं तुम्हारी जिज्ञासा को शांत कर सका और अच्छे मार्ग पर ला सका तो शायद इस सभा से भी बढ़कर पुण्य का कार्य होगा ऐसा कहते हुए भालू शांत हो गया बंदर के मुख पर संतुष्टि का भाव था वह भालू के हृदय में व्याप्त असीम पीड़ा को स्पष्ट तौर से उसकी मुद्रा पर देख सकता था पता नहीं वह आकाश की तरफ देखता चला जा रहा था जैसे वह ईश्वर से संवाद स्थापित कर रहा हो बन्दर इस दृश्य को देखकर आनंद से गदगद हुआ जा रहा था एक क्षण के लिए लगा उसके सारे दुख दर्द दूर गए हो अपने संचित कर्मों का फल मिल गया हो जीवन आनंद से परिपूर्ण हो गया अपने को कितना भाग्यशाली समझ रहा था मन ही मन उस भाग्य विधाता के प्रति कृतज्ञता प्रकट किए जा रहा था अब उसको कथनी करनी में अंतर समझ आ गया था
   
  

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