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चित्रकार राम जैसवाल

शीर्षक: रंगों के जादूगर और शब्दों के साधक: प्रोफेसर राम जायसवाल को एक श्रद्धांजलि
दिनांक: 8 जनवरी 2026
कल दिनांक 7 जनवरी 2026 को भारतीय कला जगत के एक चमकते सितारे, प्रोफेसर राम जायसवाल, अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गए। वे केवल एक कलाकार नहीं थे, बल्कि एक ऐसी संस्था थे जिन्होंने ब्रश की नोक से पानी के रंगों (Watercolours) को बोलना सिखाया।
एक अद्वितीय कला यात्रा: सादाबाद से अजमेर तक
5 सितंबर 1935 को उत्तर प्रदेश के मथुरा (सादाबाद) में जन्मे राम जायसवाल ने अपनी कला का प्रशिक्षण लखनऊ के कला एवं शिल्प महाविद्यालय से प्राप्त किया। बाद में राजस्थान की धरा को अपनी कर्मस्थली बनाया। अजमेर के दयानंद महाविद्यालय में चित्रकला विभाग के प्रोफेसर के रूप में उन्होंने हज़ारों विद्यार्थियों को कला की बारीकियां सिखाईं।
जलरंगों का जादूगर (Master of Watercolours)
राम जायसवाल को 'वॉश पेंटिंग' (Wash technique) और जलरंगों के प्रयोग में महारत हासिल थी। उनकी कला की कुछ खास विशेषताएँ थीं:
बंगाल स्कूल का प्रभाव: उनकी कृतियों में कोमलता और रंगों का जो सामंजस्य दिखता था, वह बंगाल स्कूल की परंपरा से प्रेरित था।
प्रकृति से प्रेम: उन्होंने प्रकृति के शांत रूपों को कागज़ पर उतारा। उनकी पेंटिंग्स जैसे 'गोमती तट' और 'रेजीडेंसी' आज भी कला प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
मानवीय संवेदनाएँ: उनकी प्रसिद्ध पेंटिंग "बंदी" और "वियोगी" इंसानी जज्बातों की गहरी अभिव्यक्ति पेश करती हैं।
साहित्य में पैठ: कला और कलम का संगम
बहुत कम कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी पकड़ रंगों और शब्दों, दोनों पर बराबर होती है। राम जायसवाल एक मंझे हुए कहानीकार और कवि भी थे।
उनके कहानी संग्रह "असुरक्षित", "समयदंश" और "विष-जाल" सामाजिक विसंगतियों पर गहरा प्रहार करते हैं।
उनका कविता संग्रह "बिम्ब-प्रतिबिम्ब" उनके संवेदनशील हृदय का प्रमाण है।
सम्मान और विरासत
कला और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बार सम्मानित किया गया:
राजस्थान ललित कला अकादमी द्वारा 'कलाविद' (1997)।
राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा 'विशिष्ट साहित्यकार सम्मान'।
उन्हें कला और साहित्य के प्रति उनके समर्पण के लिए 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड' से भी नवाजा गया।
अंतिम शब्द
प्रोफेसर राम जायसवाल भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं, लेकिन उनकी पेंटिंग्स और उनकी कहानियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी रहेंगी। अजमेर की गलियों और कैनवास के रंगों में उनकी स्मृतियाँ हमेशा जीवित रहेंगी।
भारतीय कला जगत के इस महान स्तंभ को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।

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