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kalakar mukul chandra dey

मुकुल दे मुकुल दे

mukul dey का परिचय 

  • जन्म           23 जुलाई 1895 
  • मृत्यु            1 मार्च 1989 शान्तिनिकेतन  
  • व्यसाय        छापाकार 

Mukul Chandra Dey का जीवन परिचय और शिक्षा

          मुकुल चंद्र डे भारतीय कला के ऐसे मूर्धन्य कलाकार हैं जिन्होंने चित्रकला के साथ-साथ छापा कला में अपनी पूर्ण रूप से उपस्थिति दर्ज कराई शांतिनिकेतन में छापाकला के एक उत्कृष्ट छात्र के रूप में अपनी उपस्थिति भी दर्ज की मुकुल चंद का जन्म 1895 ईस्वी में बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत हुआ था जो वर्तमान में बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है कला के प्रति उनकी रुचि बाल्यकाल से ही दिखाई पड़ने लगी थी परिणाम स्वरुप 1912 ईस्वी में इनके पिता ने इन्हें शांतिनिकेतन के कला भवन में प्रवेश दिला दिया जहां पर नंदलाल बसु और असित कुमार हलदर के निर्देशन में शिक्षा प्राप्त की और अवनीनाथ ठाकुर तथा रविंद्रनाथ ठाकुर जैसे श्रेष्ठ कलाविद एवं बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तितत्वों का संरक्षण भी प्राप्त हुआ

       1915 ईस्वी में रविंद्रनाथ ठाकुर और नंदलाल बसु के साथ सियालदह में पद्मावती नदी के तट पर एक मास तक प्रवास किया जहां का सुरंग वातावरण इनके अंतः करण को भा गया जो रह-रहकर इनके कलाकृतियों में भी उभरने लगा प्रकृति का शांत मधुर एवं आंखों तथा हृदय को लुभाने वाले दृश्यों की ऐसी अमिट छाप इनके अंतःकरण पर लगी जो जीवनभर उनके चित्रों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रगट होती रही 

     अवनींद्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित विचित्र सभा के मुकुल चंद्र सक्रिय सदस्य थे इस संस्था ने थोड़े समय में ही कई छापाकारों को जन्म दिया मुकुल चंद्र डे शांतिनिकेतन से अपनी शिक्षा पूर्ण कर 1916-17 अमेरिका में रहे जहां जेम्स ब्लाइंडिंग स्लेन से अम्लाकन की शिक्षा प्राप्त की और थोड़े समय के लिए जापान में भी जाकर प्रिंटिंग तकनीक से जुड़ी हुई बारीकियां सीखी भारत लौटकर पुनः अम्लाकन में कार्य प्रारंभ कर दिया

      कोलकाता में इस समय रामेंद्र नाथ चक्रवर्ती तथा मनींद्र भूषण गुप्त प्रिंट मेकिंग में कार्य कर रहे थे 1919 में मुकुल चंद्र डे ने लकड़ी के ब्लॉकों की सहायता से नाव पर मानव जीवन नामक छपा चित्र बनाया 

      अम्लाकन और उत्कीर्ण में स्वयं को और निपुण बनाने के लिए एक बार फिर विदेश का रास्ता पकड़ा इस बार हेनरी टोंकास Henry tonks के संरक्षण में स्लेड स्कूल स्कूल ऑफ आर्ट लंदन में प्रशिक्षण प्राप्त किया 1928-29 के मध्य मुकुल चंद्र डे रॉयल कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट से भी संबंधित रहे तथा लंदन स्थित इंडियन हाउस में भित्तिचित्र बनाने वाली समिति के सलाहकार सदस्य भी रहे kings Alfred's school Landon के सम्पर्क में भी रहे लंबे प्रवास के बाद अमेरिका होते हुए 1929 में मुकुल चंदे स्वदेश लौट आए

      अंतिम समय तक मुकुल चंद्र डे छापा कला की एचिंग और इंग्रेविंग तकनीक में प्रयोग करते रहे 1 मार्च 1989 ईस्वी को भारतीय कला के इस महान कलाकार का स्वर्गवास हो गया जिसने भारतीय आधुनिक छापा कला की नीव को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई मुकुलचंद डे ऐसे पहले भारती छापाकार थे जिन्होंने विदेश में जाकर इचिंग पद्धति की शिक्षा हासिल की हो

मुकुल चंद्र के चित्र

  • तर्पण
  • फिशर गर्ल
  • अवनींद्रनाथ ठाकुर - ड्राई प्वाइंट
  • Midnight cry
  • On the way to Puri - etching
  • शकुंतला की विदाई - etching

मुकुल चंद्र की पुस्तक

My first teaching

मुकुल डे की चित्रण शैली

       मुकुल डे की आरंभिक शिक्षा शांतिनिकेतन में हुई थी जहां का शांत वातावरण ने उनके हृदय पर अटूट छाप छोड़ी डे एक संवेदनशील कलाकार थे जिन्होंने विषयों को सदैव आम आदमी के दृष्टि से देखा भारतीय जनजीवन और किदुवंतियों से संबंधित चित्रों को बनाने के लिए भले ही विदेशी शैली को अपनाया हो परंतु बंगाल का लोक जीवन सदैव उनके चित्रों में उभरता रहा नदी किनारे के दृश्य के बाजार बीरभूम संथाल गांव आदि सभी ने मुकुल डे का ध्यान अपनी तरफ सदैव आकर्षित किया उपरोक्त विषयक चित्रों को डे ने अत्यंत आत्मीयता के साथ चित्रित किया है

प्रमुख चित्रों में गंगा स्नान, पालदार नौकाए, तर्पण आदि चित्र परंपरागत पद्धति में बनाए जिन पर बंगाल शैली का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।   

     अपनी विदेश यात्रा के दौरान मुकुल चंद्र डे की शैली में व्यापक रूप से परिवर्तन दिखाई पड़ता है अमेरिका जापान और लंदन में छापा कला की बारीकियों को जाना और समझा एचिंग पद्धति में देश के कई जाने-माने व्यक्तित्व की के व्यक्ति चित्र बनाएं जिनमें से महात्मा गांधी, रवींद्र नाथ टैगोर अल्बर्ट आइंस्टीन, एनी बेसेंट, अवींद्रनाथ ठाकुर चांदनी रात में गंगा, अजंता की राह आदि एवं ड्राइप्वाइंट में नृत्यरत लड़की उनका उत्कृष्ट चित्र है मुकुल चंद्र को एचिंग और ड्राइप्वाइंट के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा

     मुकुल डे एक कलाकार के साथ साथ कला के संरक्षक के रूप में भी याद किए जाते रहेंगे इनके संग्रह में कालीघाट एवं अन्य देसी शैलियों के चित्र विद्यमान थे परंतु कारणों से इस संग्रहालय को बेचना पड़ा

मुकुल डे को पुरस्कार एवं सम्मान

  • शिकागो सोसायटी आफ एचर्स का सदस्य 
  • ललित कला अकादमी की फेलोशिप 
  • अवनीनाथ पुरस्कार 
  • रॉयल कॉलेज ऑफ लंदन की स्कॉलरशिप 
  • रविंद्र भारती विश्वविद्यालय कोलकाता से डिलीट की उपाधि 
  • बर्मिंघम पैलेस में किंग जॉर्ज पंचम द्वारा जुबली मेडल 
  • अमेरिका की फुलब्राइट को स्कॉलरशिप

अध्यापन

    11जुलाई 1928 मुकुल चंद्र डे बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट के प्रधानाचार्य पद पर नियुक्त हुए जो 1943 तक लगातार कार्य करते रहे रविंद्र नाथ टैगोर तथा यामिनी राय के चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की इनके समय में ही बंगाल स्कूल आफ आर्ट में महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार मिला

प्रदर्शनी तथा संग्रह

    डे की पहली प्रदर्शनी 1928 में कोलकाता में आयोजित हुई तत्पश्चात पेरिस, नीदरलैंड, लंदन, सेंट फ्रांसको, शिकागो, ओरिएंटल स्कूल आफ आर्ट कोलकाता 1928, श्री लंका, बर्मा, शांतिनिकेतन 1946-51, और कामनवेल्थ आर्ट इंस्टिट्यूट लंदन 1959 में आयोजित हुई

मुकुल डे के चित्र भारत में कोलकाता वाराणसी नागपुर आदि स्थानों पर संग्रहित हैं वहीं विदेशों में जापान फ्रांस इंग्लैंड अमेरिका हॉलैंड आदि देशों में संग्रहित हैं
  
                 इस प्रकार से हम कह सकते हैं मुकुल चंदन डे आरंभिक शिक्षा शांतिनिकेतन में प्राप्त की तत्पश्चात देश विदेश का भ्रमण कर छापा चित्रण की इचिंग और ड्राइप्वाइंट तथा उत्कीर्ण तकनीक में महारत हासिल किया फिर भी विषयों की दृष्टि से भारतीयता सदैव उनके चित्रों में हावी रही छापा कला के आरंभिक कलाकारों में मूलचंद डे का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है इन्होंने कोलकाता स्कूल के प्रधानाचार्य रहते हुए छापा चित्रों के प्रकाशन के लिए एक मैगजीन भी निकाली इनके कार्यों के फल स्वरुप छापा कला को भारत में एक नई पहचान मिल सकी
 


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