क्षितिन्द्र नाथ मजूमदार
संत चित्रकार क्षितिन्द्र नाथ मजूमदार
जीवन परिचय और शिक्षा
क्षितिन्द्रनाथ की कला यात्रा
क्षितिन्द्रनाथ की जीवनी यात्रा को देकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे मजूमदार साहब को कला ने स्वयं चुना हो सीधे सरल सहज स्वभाव वाला व्यक्तित्व तथा साधारण जीवन जीते थे जो इनकी कला में भी स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है एक बार रॉयल कॉलेज ऑफ आर्ट, लंदन के अध्यक्ष रोथेन्स्टीन कोलकाता भ्रमण के समय बंगाल स्कूल आफ आर्ट मैं पधारे जहां पर बालक क्षितिन्द्रनाथ मजूमदार की प्रतिभा को देखकर अत्यधिक प्रभावित हुए तथा मजूमदार को ₹10 देकर 3 चित्र बनवाए जिनमें राधा का अभिसार नामक चित्र सौ रुपए में खरीद लिया रोथेन्स्टीन को मजूमदार के मुखमंडल पर गौतम बुद्ध जैसी शांति का अनुभव होता था बंगाल के शिशिर कुमार घोष ने मजूमदार को वैष्णो चित्रकार कहकर पुकारा है चैतन्य का गृह त्याग चित्र से प्रसन्न होकर उन्होंने ₹200 का पुरस्कार दी दिया अवनींद्रनाथ ने चैतन्य विषयक चित्रों को देखकर उन्हें पूरी की यात्रा करने की सलाह दी मजुमदार अतिरिक्त समय में आवनी बाबू को वैष्णो भजन सुनाया करते थे शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट सोसायटी, कोलकाता में शिक्षाक के रूप में नियुक्त किया गया
शैली का विकास
वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायी क्योंकि क्षितीन्द्रनाथ एक संस्कारित परिवार से संबंध रखते थे, अतः उनकी कला के प्रति समर्पण की भावना उनके वैष्णव मर्यादा के अनुरूप थी, जिसके लिये आपने आजीवन अपनी प्रतिबद्धता निभाई। यही कारण है कि आपके चित्रों के विषय भी धार्मिक, पारम्परिक तथा पौराणिक थे।
कोलकाता में रहकर भी वे पूरी तरह 'शहरी नहीं बन पाये और ग्रामीण संस्कृति सदैव उनकी कल्पना पर छाई रही। अपने गुरु अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति अनुराग होने पर भी उन्होंने उनकी शैली की अनुकृति नहीं की बल्कि अपनी मौलिक शैली खोजी चित्र बंगाल के लोक-जीवन से प्रेरित हैं। इन्हीं के द्वारा उन्होंने रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्यों के पीछे छिपी मूल भावना को व्यंजना प्रदान की है। उनके व्यक्तित्व का सच्चा प्रतिबिम्ब 'राधा' के रूप में मिलता है। उन्होंने अन्य नारी पात्रों में भी राधा की ही झाँकी देखी है जो उनके 'रासलीला' नामक चित्र से पूर्ण स्पष्ट हैं। उनके चित्रों में मानवाकृतियों के साथ वृक्षों, लताओं तथा कुटियों का बड़ा ही संगतिपूर्ण संयोजन हुआ है। चमकदार, कोमल तथा पारदर्शी रंगों और विशेष रूप से मुक्ता की आभा के समान श्वंत रंग के प्रयोग से वे चित्रों में संगीतमय वातावरण का सृजन कर देते हैं फिर भी उनमें सरलता है। कला की तत्कालीन कसौटी जिसमें परिष्कृति पर बहुत बल दिया जाता था

