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Colour

रंग Colour

         रंगो के द्वारा मानव अपने जीवन को विविध प्रकार से सजाता है गुहावासी मानव से लेकर आप तक इनका महत्व कम नहीं हुआ है रंग मनुष्य को सदैव अपनी तरफ आकर्षित करते रहते हैं इनके सौंदर्य के वशीभूत होकर ही मनुष्य ने रंगो को परस्पर मिलाकर विविध प्रकार की रंगत ओं का निर्माण किया है वैसे तो रंग प्रकाश का गुण है और उसी की मात्रा पर उनका मान निर्भर करता है प्रकाश कम या अधिक होने से उनकी रंगत में भी परिवर्तन दिखाई पड़ता है पर सामान्यता दर्शक इन सूक्ष्म आयामों पर विचार नहीं करता वह तो महेज उनके नामों से ही पहचानता है फिर भी कहीं ना कहीं इनका प्रभाव उसकी मनोदशा पर भी पड़ता है तभी तो रंगो का विशेष ध्यान रखा जाता है किस परिस्थिति में किस प्रकार के परिधान या रंगों का उपयोग करना चाहिए

          रंग या वर्ण की परिभाषा

वर्ण प्रकाश का वह गुण है जो कोई स्थूल वस्तु नहीं इसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि अक्ष पटल  द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला एक प्रभाव है

      दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि रंग प्रकाश की उपस्थिति के कारण हमें दिखाई पड़ते हैं रंगो का मान भी प्रकाश की मात्रा पर निर्भर करता है जैसे-जैसे चीजें प्रकाश से अंधकार की तरफ जाती हैं वैसे-वैसे उनकी रंगत परिवर्तित होती रहती है और जैसे ही वह अंधकार से प्रकाश की तरह आती है वैसे ही रंग तो में पुनः परिवर्तन दिखाई देता है यह परिवर्तन कलाकार निरंतर कार्य कर कर धीरे धीरे आत्मसात करता जाता है

 वर्ण के गुण

     वर्ण के 3 प्रधान गुण माने जाते हैं

1 रंगत Hue  

रंग की प्रकृति का बोधक होता है अर्थात इसके द्वारा कि हम एक रंग से दूसरे रंग को पृथक कर पाते हैं  जैसे नीला लाल पीला साथ ही रंगों के मेल से बनने वाली रंग तो को भी पहचानते हैं

2 मान Value 

यह रंग के हल्के गहरेपन का घोतक है जैसे हल्का हल्का लाल गहरा लाल मध्यम लाल आदि यदि किसी रंग में सफेद रंग को मिला दिया जाए तो उसका मान बढ़ जाता है और किसी रंग में काले रंग को मिला दिया जाए तो उसका मान घट जाता है इन दोनों के प्रयोग से कलाकार विभिन्न प्रकार की रंग तो को प्राप्त करता है तथा लगातार इसका प्रयोग कर कलाकार धीरे-धीरे इस विधा में पारंगत हो जाता है

3 सघनता Croma or intensity or saturation            

 सघनताा रंग की शुद्धता का परिचायक है इसके द्वारा हम यह जान पाते हैं कि रंग कितना शुद्ध है जितना रंग प्रखर होगा उतना ही शुद्ध होगा जितना धूमिल होगा उतना ही शुद्धता उसकी कम होती जाएगी रंग के उच्चतान को टिंट tint तथा निम्न तान को सेड shade कहते हैं

  • Tint =colour+white 
  • Shade= colour+Grey ( mixture of black and white)

वर्ण भेद  Classification of colour

        मुख्य वर्ण और उनके परस्पर मिश्रण के द्वारा निर्मित रंगतो को अलग अलग किया जाता है हमारे प्राचीन शिल्प ग्रंथों में भी रंग पर अलग-अलग प्रसंग वस चर्चा हुई है हम इनको निम्न भागों में विभक्त कर सकते हैं

मुख्य रंग primary colour

   वह रंग जो किसी मिश्रण से प्राप्त नहीं होते हैं प्राथमिक रंग का लाते हैं जैसे लाल पीला नीला ये रंग  पूर्ण रूप से शुद्ध होते हैं तथा इनका अपना अस्तित्व होता है यह मुख्य रंगते पदार्थ ( pigment) की होती हैं प्रकाश में प्राथमिक रंगते इससे भिन्न होती हैं जैसे हरी लाल बैंगनी प्रमुख मानी जाती हैं यदि इन तीनों को समान अनुपात में मिलाया जाए तो श्वेत वर्ण के रूप में परिवर्तित हो जाती है

द्वितीयक रंगते secondary colour

   दो प्राथमिक रंगों के मेल से बनने वाले रंग द्वितीयक रंग कहलाते हैं जैसे लाला + पीला= नारंगी,  लाल + नीला =बैंगनी, नीला +पीला  =हरा

तृतीयक रंगते 

  प्राथमिक और द्वितीयक रंगों के मेल से बनने वाले रंग तृतीयक रंग का लाते हैं जैसे हरा+बैंगनी =olive green

समीपवर्ती रंग

समीपवर्ती रंग बेरंग होते हैं जो एक ही परिवार के सदस्य होते हैं जैसे पीला, पीला नारंगी, तथा नारंगी, सभी में पीला रंग उपस्थित है

विरोधी रंग opposite or complementary colour

    वर्णचक्र में आमने-सामने के रंग विरोधी रंग कहते हैं इनको परस्पर मिलाने पर धूमिल रंगों का निर्माण होता है मनोवैज्ञानिक चार रंग प्रमुख मानते हैं लाल, हरा, पीला तथा नीला रंग का संबंध हमारी दृष्टि तंतु से भी है जर्मन वैज्ञानिक प्रोफेसर ऑस्टवाल्ड (Wilhelm Ostwald) ने इन्हीं 4 रंगों के आधार पर 8 रंगों का एक आदर्श चक्र तैयार किया है जिसमें चार रंग प्राथमिक तथा चार द्वितीयक रंग हैं प्रायः कार्यरत सभी चित्रकार त्रिवर्ण चक्र को ही अपने उद्देश्य में ठीक माना है

एकाकी वर्ण monochrome

   एक ही रंग की विभिन्न मान तथा सघनता वाली तान  को एकाकी रंग कहा जाता है क्योंकि यह एक ही रंग के विविध टोन होते हैं जैसे हल्का लाल, गहरा लाल, लाल

वर्ण शून्यता achromatic

इस पद्धति में केवल स्वत एवं श्याम रंग का प्रयोग किया जाता है

बहुवर्णिय नियोजन polychromatic

     इस विधा में कलाकार अपनी इच्छा के अनुसार विविध प्रकार के रंगों का प्रयोग कर सकता है

वर्ण बोध knowledge of colour

   जब वस्तु पर प्रकाश पड़ता है तो वह उस रंग को अवशोषित कर लेती है जिस रंग की वस्तु होती है शेष को परिवर्तित कर देती है इसीलिए हमें वस्तु रंगीन दिखाई पड़ती है अक्षपटल  के पार्श्व में रोड roads व कोंस Cones नामक सूक्ष्म ग्रंथियां होती हैं जिनके द्वारा हम वस्तु से परावर्तित तरंगों द्वारा वस्तु का वर्ण अनुभव करते हैं काले और सफेद रंग की दृश्य अनुभूत रोड के द्वारा तथा रंगीन रंगतो की अनुभूति कोंस के द्वारा होती है

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